फिर कैसे ना Crassa मात खाए?


हुश्न है एक, हजारों अदाएं
फिर कैसे ना Crassa मात खाए?

कभी वक्षों पे जुल्फें,
कभी नितम्बों पे नागिन लहराए।
फिर कैसे ना Crassa मात खाए?

कभी नैनों से मदिरा छलके
कभी मृग सी मन बहकाए।
फिर कैसे ना Crassa मात खाए.

परमीत सिंह धुरंधर

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