ये वस्त्र अब दरिंदे


ये प्रेम की वादियाँ
ये रातों के शिकंजे।
ये जवानी का दौर
और ये तेज होते पंजें।

धमनियों में दौरने लगा है
अब लहू कुछ यूँ
की जिस्म को लगते हैं
ये वस्त्र अब दरिंदे।

तुम्हारी बाहों में आकार
यूँ आजाद होने का एहसास है
जैसे आसमा के तले
पंख पसारे परिंदे।

परमीत सिंह धुरंधर

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