ठहाके लगने लगते हैं


जहाँ भी बैठ जाए
ठहाके लगने लगते हैं.
दौर कोई भी हो
आसमा पे इंद्रधनुष खिलने लगते हैं.
दुश्मन की उड़ जाती हैं नींदे
उनके इतिहास के किस्से खलने लगते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

Leave a comment