कुछ किस्से
वो कमर से लिख गयीं।
कुछ किस्से
वो नजर से लिख गयीं।
जब और लिखना
मुमकिन ना रहा.
वो अपने अधरों को
मेरे अधर पे रख गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
कुछ किस्से
वो कमर से लिख गयीं।
कुछ किस्से
वो नजर से लिख गयीं।
जब और लिखना
मुमकिन ना रहा.
वो अपने अधरों को
मेरे अधर पे रख गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
जो सफर में है उसे शहर से क्या मतलब?
मुझे शौक तेरी अधरों का है, तेरी वफ़ा से क्या मतलब?
ला पिला दे तू हलाहल का प्याला
जब तू ही किस्मत में नहीं तो अंजाम से क्या मतलब?
परमीत सिंह धुरंधर
भीड़ में बहती जो वो नीर तो नहीं
तन्हाई में सूखती वो पीर तो नहीं।
टूटते तारें आसमाँ के
कहीं उनका निशाँ तो नहीं।
व्याकुल मन जिसे पल – पल पुकारे
वसुंधरा पे वो कहीं तो नहीं।
इससे बड़ी पराजय क्या होगी?
जब जीत की कोई लालसा ही नहीं।
उतार दो तुम ही ये खंजर मेरे सीने में
इन धड़कनों को तुम्हारी वेवफाई पे यूँ यकीं तो नहीं।
मुझे नहीं पता ए शिव तुम कहाँ हो?
मगर कोई और नाम सूझता भी तो नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
Ohh Lata, Ohh Lata
Give me a clue, Lata
When will you be free?
So, we can go for tea, Lata.
Don’t take so much time
To decide
Because life is short
And time is flying, Lata.
I can cook rice
If you bring the curry
We can eat together
By watching a movie, Lata.
You bring my happiness
You bring my smile
When we walk down the road
I feel like a victory, Lata.
You are in my heart
You are in my mind
But, I also need you
For my eye, Lata.
You can serve me
Or you can punish me
Whatever you want
Because you are my queen, Lata.
Parmit Singh Dhurandhar
रक्त के हर बून्द की तुम बन गयी हो प्यास
तुम मिलती हो तो लगता है वक्त भी ख़ास.
तो मत रहो यूँ दूर – दूर, शर्म में बंध कर
आवो, मैं बेशर्म बनके तुम्हारी बेड़िया तोड़ दूँ।
मौन हो तुम पर मैं जानता हूँ
तुम्हारे ख़्वाबों में भी उड़ते हैं कई पंक्षी
तुम कहो तो आज तुम्हारे पंक्षियों को
मैं भी थोड़ा अपना दाना डाल दूँ.
तुम्हारे मुख पे घूँघट और ये झुके नयन
कब से बन गए हैं ये तुम्हारे बंधन?
ये तो मुझको रिझाने के तुम्हारे श्रृंगार हैं
तुम कहो तो आज थोड़ा
तुम्हारे अंगों का मैं श्रृंगार करूँ।
परमीत सिंह धुरंधर
सैया छिलह तारान आज कल दही पर के छाली
करके हमके लरकोरी, खुद भइल बारन मवाली।
खेता – खेता, गाछी – गाछी, सुस्ता तारान खटिया डाल के
और यहाँ सुलग ता रात – रात भर हामार छाती।
डर ता जियरा की कहीं नवे महीना में
लेके मत आ जाइ अंगना में दूसर घरवाली।
परमीत सिंह धुरंधर
दिल जब भी शिकार पे निकला
शिकार हो गया.
उसने ऐसे नजर ही रखी
दिल लाचार हो गया.
परमीत सिंह धुरंधर
खेतों में पानी ला दो
और खलिहान में भर दो आनाज
कुछ ऐसा कर दो मोदी जी
की संसद में बैठें किसान।
मंदिर तो बनने से रहा
ना सुलझेगा काश्मीर
छोड़ो ये, कुछ ऐसा कर दो मोदी जी
की बच्चों के हाथों में हो किताब।
नारी निर्भीक हो जाए
ना कसे कोई उसपे लगाम
कुछ ऐसा कर दो मोदी जी
गावं – गावं हो जाए खुशहाल।
दवात-कलम से सजे हो गलियाँ
और बटती रहे घरों में मिठाइयाँ
कुछ ऐसा कर दो मोदी जी
फिर से जले पंजाब में सांझा – चूल्हा
और पके पकवान।
परमीत सिंह धुरंधर
किस देश में है मेरे बाबुल का गावं रे
मैं भूल गयी सैया तूने मुझपे ऐसे डाला हाथ रे.
एक ररत में सब रिश्ता तुमने बदल दिया
निंद्रा से खुली पलकों को तुम बहाने लगे हो पीया।
दिन – रात अब नैना जोहे बस तेरी ही राह रे
मैं भूल गयी हर राह तूने मुझपे ऐसे डाला हाथ रे.
परमीत सिंह धुरंधर
तड़प – तड़प मेरी राहों को कोई मंजिल तो मिल जाए
गगन न सही, एक समुन्दर ही मिल जाए.
तप रही मेरी साँसों को एक प्याला तो मिल जाए
मधुशाला ना सही, गरल ही मिल जाए.
परमीत सिंह धुरंधर