वो मोहब्बत की बातें, वो शरारत की रातें
खुदा जानता है, हमें आज भी हो तुम याद.
गुनाहों में साथ थे, पनाहों में साथ थे
बस किस्मत में ही नहीं लिखा था साथ.
तुम जाने कैसे जीने लगे हमसे दूर होकर
हमें तो साँसें भी लगती हैं अब दुश्वार।
ये निगाहें अब भी तुम्हे ढूंढती हैं
और कब तक तुम्हे देते रहें आवाज।
परमीत सिंह धुरंधर