खर्चा उठा ली


सारी नगरिया में चर्चा बा रउरे आमदनी के
सुनी ए बाबूसाहेब छपरा के धुरंधर
खर्चा उठा ली हमर जवनिया के.

हमरा खूंटा से कउनो गाय ना तुराईल आज तक
फंस जइबू रानी, रहे के पड़ी
साड़ी उम्र फिर संगे कोठारिया में.

परमीत सिंह धुरंधर

एक शिकायत है


नजर है, नजाकत है
अदा में अदावत है.

कमर है, क़यामत है
खुदा की इनायात है.

ना रखा करो यूँ पर्दा
बस ये ही तो एक शिकायत है.

परमीत सिंह धुरंधर

बागी – विद्रोही छपरा – का – धुरंधर


बागी – बलिया
विद्रोही – बाबा
लोहिया
के थाती
से उपजे हैं
निकले हैं
पनपे हैं.
यूँ ही नहीं हम बिगड़ैल हैं.

राजेंद्र बाबू के
पाठशाला से
जयप्रकाश के
गौशाला से
बुध और गुरु गोविन्द
के गांव से
महेंद्र मिश्र के तान से
हम पले – बढ़े
रचे – बसे हैं.
यूँ ही नहीं लोग हमें
छपरा – का – धुरंधर, बुलाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

दरजी न बाज आये


दरजी न बाज आये 
अपनी दगाबाजी से. 
नाप ले ला चोली के 
जोबन मल – मल के.

परमीत सिंह धुरंधर

ना मैं किसी चाँद का हुआ


हर शाम जल उठता हूँ चिरागे -दर्द बनकर
ना मैं किसी चाँद का हुआ, ना रात का हुआ.

यूँ मुफलिसी में आ गया हूँ इस कदर
ना मैं किसी घर का हुआ, ना घाट का हुआ.

मत पूछों हाल – जिंदगी मेरी
ना मैं जाम का हुआ, ना पैगाम का हुआ.

वो उजड़ कर भी आबाद हो गयीं
ना मैं मिट्टी का हुआ, ना हवाकों का हुआ.

परमीत सिंह धुरंधर