हमसे पूछिए शहर में नया क्या है?


हमसे पूछिए शहर में नया क्या है?
कहीं नजरें लड़ रहीं हैं,
कहीं मयखाना खुला है.’

हमसे पूछिए शहर में नया क्या है?
कोई पत्र लिख रहा है
कोई डाकिया बना है.

हमसे पूछिए शहर में नया क्या है?
इशारों – इशारों में संदेस जा रहे हैं
कहीं चुनर फंसी है, कहीं दुप्पटा उड़ा है.

हमसे पूछिए शहर में नया क्या है?
खुदा ने दे दी उनपे नजाकत
कहीं शमा जली है, कहीं अँधेरा हुआ है.

परमीत सिंह धुरंधर

पिघलता क़यामत


जो नजर में आ जाए वो ही नजाकत है
बाकी सब तो परदे के पीछे एक सियासत है.

उनका पर्दा है ए जमाना तुम्हारे लिए
मेरी बाहों में तो हर रात पिघलता क़यामत है.

परमीत सिंह धुरंधर

भोजपुरी भाषा की प्रचुरता का प्रमाण:1


दुनिया में सबसे ज्यादा पर्यायवाची शब्द पति के लिए भोजपुरी भाषा में ही है. जैसे बिहार की महिलायें अपने पति को निम्न शब्दों से सम्भोधित करती हैं. इसका एक प्रमुख कारण है की वो पति का नाम नहीं लेती हैं.
करेजा, राजा, रजऊ, करेजऊ, भतार, पति, परमेश्वर,भगवान्, भ्रह्मबाबा, बाबू, देवता, मुखिया, बाबूसाहेब, मास्टर साहेब, उनकर भइया, भलुआ के पापा, मुनिया के चाचा, छोटुआ के फूफा, बबुनी के जीजा, आँख के तारा, जलेबी, रसगुल्ला, प्राणनाथ, स्वामी, प्राणेश्वर, इत्यादि।

परमीत सिंह धुरंधर

बस दो बून्द ढलका दिया


मेरी उम्र गुजर गई जिस मयखाने में
वहीँ पे शहर ने अपना गुलशन बना लिया।

ता उम्र हम जिसके पिघलते रहे
उस हमनवाज ने मेरी मौत पे
बस दो बून्द ढलका दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?


तेरी एक नजर पे उम्र ठहर गयी
बस जिंदगी ने साथ नहीं दिया।
गरल ही तरल हो तो सरल क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?

तपते रेगिस्तान में
तन को झुलसाती हवायें हैं
विचलित पथिक हो तो प्रयास क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?

जीवन अमृत की तलाश में आधर पे अमृत-कलश हो
छलक गरल जाए
यह जान मुख मोड़ लूँ तो प्यास क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?

परमीत सिंह धुरंधर

जमाले-मुख


जमाले-मुख का तेरे, तोड़ कुछ भी नहीं
उसपे से ये हाय, हया, बेजोड़ इनसे कुछ भी नहीं।

भटक रहे हैं सभी तेरे तिलिश्म में
रहे हैं जुदा – जुदा, पर मंजिल कुछ नहीं।

टूटे कितने तारे इस वफाये-मोहब्बत में
मगर इस रात की सहर कुछ भी नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

गुनाहों का समंदर


जो दफ्तर में मेरे ना हुए
वो बिस्तर पे मेरे हो गए
ये गुनाहों का कैसा समंदर है?
दोस्त, दुश्मन और दुश्मन, दोस्त हो गए.

परमीत सिंह धुरंधर

हाले-दिल


जो मेरे दिल के टुकड़े -टुकड़े
तेरे नयनों से हुए.
किन राहों में थाम के तुमको
बतलाऊँ हाले-दिल प्रिये।

परमीत सिंह धुरंधर

सहर तक का सफर


रातों का सफर था
उलझनों में सनम था
सहर तक आते – आते
उसने हर दावं बदल दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

ए चांदनी


ए चांदनी एक रात के लिए कोई ख्वाब तो दो
झूठा ही सही, पर ये साथ तो दो.
ये आग बुझती नहीं, और जलाती भी नहीं यादों को
तुम कुछ ऐसा तो करो, दो घडी ही सही मीठी नींद तो दो.

परमीत सिंह धुरंधर