जहाँ मिट्टी अब बस बुतों में है


शहर अब भी दुकानों में है
गावं अब भी खलिहानों में है.
तुम जिसे ढूंढते हो
वो दिल तो किताबों में है.

तुम जाने किन हसरतों के पीछे हो
अपना आशियाना लुटा के.
उन हसरतों का किनारा नहीं
वो तो खुद मझधारों में हैं.

बरसात की चंद बूंदों से
गावं में खुशबु बिखर जाती है.
ये शहर है जहाँ मिट्टी
अब बस बुतों में है.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं शिव-शंकर सा भोला हूँ


प्रिये प्रेम मिलन में मैं तुमसे
प्रति दिन ही हारा हूँ
तुम छलती हो नैनों से
और मैं शिव-शंकर सा भोला हूँ.

तुम मृग बनकर कुलांचे भरती
मधुवन के सारे पथों पे
मैं मीरा सा तुम्हारे एक दरस को
जन्मों की प्यास संजों बैठा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ


जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.
तन – मन के आलस त्याग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

प्रभाकर चढ़ के आ गइलन अम्बर पे
तू हू अब अपना रथ के उतार अ.
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

मन के बांधल जाला, तन के ना बांधे पौरष
निंद्रा-देवी से कह द, आपन बोरिया – बिस्तर बाँधस।
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

कलरव-गान करके खगचर भरे उड़ान
तहरा देह के इ कइसन लागल थकान।
छू ने को आसमान तू भी हुंकार भर अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

परमीत सिंह धुरंधर

यार सियार आ सैंया अनाड़ी


दरिया में आग लागल बा सैंया
रूठ अ मत जवानी में.

कल्लुआ पड़ल बा पीछे हमार
ले जाए ला आपन बथानी में.

किस्मत हमार अइसन बा ए सखी
यार सियार आ सैंया अनाड़ी रे.

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे एक रात


तुम निगाहों से पिलाना जो छोड़ दो
हम कैसे जियेंगे, ये बता के छोड़ दो?

फिर न तुम्हे रोकूंगा, ना आवाजें दूंगा
तुम वक्षों पे एक रात सुला के, छोड़ दो.

जवानी में जानता हूँ हवाओं का रुख, मैं तुम्हारे
उजाड़ने से पहले बस एक बहाना छोड़ दो.

मुझे मिटा सके ये जमाना तो नहीं
तुम इस ज़माने के लिए एक ये तराना छोड़ दो.

परमीत सिंह धुरंधर

गरीबी कट जाती है


बस्ती गैरों की
रोटी अपनों की
गरीबी कट जाती है
यूँ ही ढँक-ढाँक के.

थोड़ी बच्चो की मस्ती में
थोड़ी बड़ों की बेरुखी में
गरीबी कट जाती है
यूँ ही खेल-खाल के.

अमीरी कब किसी की भी सगी रही?
दौलत से कब समंदर की प्यास मिटी?
यूँ ही सट -साट के, रूठ -राठ के
गरीबी कट जाती है एक खाट पे.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं फिसल जाउंगी


ऐसे हमसे ना
टकराना बलम
बाली उम्र है
मैं मचल जाउंगी।

दूर से यूँ ही बस
मिलाना नजर
बाली उम्र है
मैं बहक जाउंगी।

रोज सोती नहीं है
मेरी माँ यही सोचकर
की कब और कहाँ?
मैं फिसल जाउंगी।

माँ नहीं जानती की मेरे दिल में
है वो छपरा का धुरंधर
जिसके साथ एक दिन
मैं डोली चढ़ जाउंगी।

छपरा का मल्लाह


धोबन इतना ना इठला
अपने जोबन पे.
बड़ी किस्मत से मिलता है
किसी को छपरा का मल्लाह।

मैं नहीं इठलाती
मेरी कमर ही लचक रही.
रखती हूँ जिसपे
छपरा के धुरंधर को बाँध के.

परमीत सिंह धुरंधर

एक बिंदी बन के


प्रेम कितना विवश कर देता है
दो नयनों से ह्रदय को हर के.
वो तो रख लेती हैं उपवास
हम रह जाते हैं बस एक चाँद बन के.

वो चलती हैं सज के – संवर के
बाँध के साड़ी अपनी कमर से.
हम रह जाते हैं बस
उनके माथे की एक बिंदी बन के.

परमीत सिंह धुरंधर

समंदर


जब दिल टुटा
तो ए समंदर
मैं भी तुम्हारी तरह लहराया।

परमीत सिंह धुरंधर