विडम्बना


जंगल को जो अपना कहते हैं
ये कैसी विडम्बना है?
वो राष्ट्र को नहीं मानते।

पत्थर -पहाड़, पेड़
नदियाँ, सूर्य को अपना कह
पूजते हैं
पर ये कैसी बिडम्बना है?
राष्ट्र को बस भूगोल
भूगोलिक – सरंचना
और कुछ नहीं मानते।

परमीत सिंह धुरंधर 

Leave a comment