दुल्हन आज किसी और का


जिससे मोहब्बत में हमने प्रेम किया जन्मों का
वो हर कर ले गयी चैन मेरे मन का.

काली निगाहें थीं पतली कमर पे कातिल
दो तीर में ही हुआ क़त्ल मेरे दिल का.

मैं भी धुरंधर हूँ, यही सोच रण में उतरा
दो -पल में पराजित कर दर्प ले गयी मुख का.

ना रोक मुझे साकी, डूब जाने से अब तो
वो बन रही दुल्हन आज किसी और का.

परमीत सिंह धुरंधर 

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