प्रेम हो तो पिता सा


प्रेम हो तो पिता सा
अदृश्य, मगर अचल पर्वत सा.
धुप में छाँव सा
रहश्यमयी ब्रह्माण्ड में
अचल-अनंत ब्राह्मण सा.
जीवन – रूपी गरल का पान
स्वयं निरंतर करते हुए
अमृत – कलश हमारे अधरों पे
रखता, अवचलित
मौन, सन्यासी, शिव सा.

परमीत सिंह धुरंधर

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