इश्क़ पे कोई और रंग


ये दिल, ये दर्द, ये दवा
इश्क़ पे कोई और रंग चढ़ाता भी तो नहीं।

ये रोटी, ये कपड़ें, ये मकान
शहर में अब कुछ भाता भी तो नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

Leave a comment