गोविन्द, रहूंगी तुम्हारी चरणों में


रख दिया है दिल गोविन्द, मैंने तुम्हारी चरणों में
लाज रखो, या लूट जाने दो, रहूंगी तुम्हारी चरणों में.
पुलकित कली में तुम गोविन्द, तुम्ही हो उन्मत गज में
फिर कैसे कहोगे अनभिज्ञ हो तुम मेरे अन्तःमन से?
बाँध दिया है मन गोविन्द, मैंने तुम्हारी चरणों से
मान रखो, या मिट जाने दो, रहूंगी तुम्हारी चरणों में.
हंस कर पी जाउंगी गोविन्द, विष का भरा ये प्याला
तुम थामों ना थामों बाहें मेरी, मैं रहूंगी तुम्हारी चरणों में.
तुम हो सर्वज्ञ गोविन्द, तुम ही हो व्याप्त कण-कण में
फिर कैसे अनभिज्ञ हो, मेरी इस करुण-पुकार से?
सर्वश्व छोड़ कर गोविन्द, बैठी हूँ तुम्हारी चरणों में.
लाज रखो, या लूट जाने दो, रहूंगी तुम्हारी चरणों में.

Rifle Singh Dhurandhar

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