क्यों नहीं?


हो गए एक तुम सारे जग के
फिर मेरे ही तुम क्यों नहीं?
हर रंग है तुम्ही से जग में
फिर मैं ही रंगी क्यों नहीं?
हर रस में हो तुम, हैं तुम्ही से पराग
फिर मिली मुझे ये मिठास क्यों नहीं?
पनपा हर जीवन तेरे सांचे पे
तेरी उँगलियों ने तरसा इन्हें
फिर मुझमे ही तेरी वो छुअन क्यों नहीं?
भज के एक तेरा नाम सभी
हो जाते हैं भाव सागर पार
एक मेरी ही बेड़ियाँ अभी तक टूटी क्यों नहीं?
राधा-रुक्मिणी, जामवंती, सभी को मिला तेरा साथ
फिर एक मीरा के आँचल में ही तू क्यों नहीं?

Rifle Singh Dhurandhar

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