वो मुझसे मिले मेरी महफ़िल में आकर
सितारा बन गए हैं हमें जमीन पे लाकर।
वो उलझने अब आँखों से बयां नहीं करते
बता देते हैं बस मेरा नाम सुनाकर।
सभी को इश्क़ में कुछ -ना- कुछ मिला
खुदा ने मेरे लिए रखा बस तन्हाई को बचाकर।
कुछ भी नहीं मांगता हूँ अब मोहब्बत में किसी से
इस कदर रख दिया है उसने दिल को तोड़कर।
मीर-ग़ालिब, फैज -फज़ल, सभी लिख गए हुस्न पे
पर कोई नहीं गया इसकी दवा बता कर.
मैं बता रहा हूँ मगर तुम समझोगे नहीं
की अभी-अभी हलक से उतरी है वो इठलाकर।
दरिया -समंदर, चाँद -सितारे, कुछ भी नहीं दिखेगा
जो देखोगे उनकी आँखों में आँखे डालकर।
मेरे हालत तो हो ही गए हैं बद -से-बदतर
वो भी चलने लगे हैं मुँह को छुपाकर।
आवाजे दी जाएँ भी तो किसको अब यहाँ से
सभी खुश हैं अपनी कानों में तेल डालकर।
वो परदे में चली जाती हैं हर किसी से मिल के
ले जाती बस सबके कपडे उतार कर.
मैं नहीं समझा, तुम नहीं समझे तो क्या समझेगा जमाना?
कैसे जुदा होती हैं राहें एक साथ चलकर।
तुम नहीं समझे मेरी मोहब्बदत की वो बातें
जिसे सुनने को आते थे तुम दबे पाँव अँधेरे में चलकर।
कैसे सम्भालूं खुद को तू ही बता दे खुदा?
कौन सम्भला है यहाँ मयखाने में आकर.
इन राहों का अंजाम बस एक ही है
चाहे निकलो इनपे मीर या जालिब को पढ़कर।
माँ ने खिलाया जी बच्चे को अपना दिल समझकर
वो माँ को खिला रहा है एक बोझ समझकर.
आवाजें दिया जिसने जितने करीब से
मिला उतना ही गहरा खंजर उतारकर।
अजनबियों को मैं नहीं अजनबी कहता
जब अपने मिलते हैं हर बार नया नकाब पहनकर।
हमारी ही साजिसों ने हमें लूट लिया
कौन बचा हैं गुनाहों की चादर ओढ़कर।
रहा ता उम्र मैं बंदिशों में
वो मिली ही नहीं कभी दिल जोड़कर।
उफनती लहरों पे तैरा कई बार
डूबा, जब उतरा लहरों पे आँखे मूँद कर.
सिर्फ मैं ही नहीं, तू ही नहीं, समंदर भी है दर्द में
कहाँ मिटा उसका खारापन इतनी दरियावों को पीकर।
आदाएं देखिये की अब जमाना देख रहा है
इस ऊंचाई पे नहीं पहुंचे हैं वो, सिर्फ मुस्कराकर।
जो कल तक मेरे थे, अब आपके संग बैठे हैं
जो आपके संग बैठें हैं, बैठें हैं कई खंजर लेकर।
बिखर जाने दो मेरे आशियाने को
बचाएं भी इसे तो अब किसका नाम लेकर।
खुलेंगी तो फिर कई परतें खुलेंगी
यूँ ही नहीं मरता है कोई सीने में राज दबाकर।
RSD