ऐसी चोट खाई है


मौसम सा हैं वो या मौसम भी उसका मासूक है
कमर पे बादल और केशुवों में हवा महफूज हैं.
रुत बदले भी तो कैसे बिना तेरी अंगराई के
तेरी आँखों में सागर और कमर पे पुरवाई है.
उसका बांधना जुल्फ को यूँ फूलों से
क्या किसी ने कभी ऐसी चोट खाई है.
उड़ती हैं तितलियाँ जिसके दीदार पे
हमने तो उसकी एक ही नजर में होश गवाई है.
टूटे भी इश्क़ में तो गम नहीं,
मीठी मिलन के बाद ही दर्दे-जुदाई है.

RSD

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