बहुत दूर तक समंदर है
फिर भी इंसान प्यासा है.
आसमा पे उड़ती चिड़ियाएं
ढूंढती सिर्फ पानी और दाना है
सबकुछ है फिर भी भाग रहा है इंसान
जाने इस ज़माने में किसको क्या पाना है?
छावं देते वृक्ष को काट देते हम हैं
और धुप में ढूंढता वो ही इंसान फिर ठिकाना है.
जिस्म की प्यास में उलझ के रह गयी जिंदगी
खोज हैं प्यार की, ये तो बस झूठा बहाना है.
RSD