दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली


इश्क़ करो तो बेवफा से, इस दर्द के बिना इश्क़ क्या
समन्दर को पता है कितने किनारो से गुजरी है दरिया।

खेलता रहूं मैं तुम्हारे वक्षों से
जैसे खेलती हैं लहरें किनारों से.
क्या तुम मुझे, मेरी जड़त्व को
लहरों सा स्वीकार करोगी?
और आओगी सर्वस त्याग कर, निर्वस्त्र मेरी आगोस में.

दीवारों पे आपकी तस्वीर लगा कर जी सकता हूँ
मगर इन साँसों का क्या जिनको आपका इंतज़ार है
इन रातों का क्या जिसमे दहकती अंगार है.

ख़्वाबों तक ही रह गयी मेरी प्यास
निगाहें मिली, बरसात भी हुई पर मिट ना सकीय ये आग
जा तुझे छोड़ रहा हूँ तेरी ही ख़ुशी के लिए
तू किसी की भी बाहों में झूल ले
पर ना मिलेगी मेरी बाहों की मिठास।

तू हरियाणवी छोरी मैं छोरा बिहार का
तेरी आँखों से हो के जाता है मेरा रास्ता बिहार का.
तू बलिष्ठ, बुलंद शेरनी, मैं बांका बिहार का
तेरी हाथ की लकीरों पे रचा है नक्शा मेरे गावं का.
तू मदमस्त, मोहनी, मृगनयनी, मैं तोमर बिहार का
तेरे वक्षों पे बसा हैं मेरा संसार प्यार का.

कितने वादे हुए, कितने इरादे बने,
कितने सपनों को थे हम पाले।
आज भी मेरे जिस्म पे उसके नाखूनों के खरोंचें हैं
सारे ही सपनों पे वो कर व्रजपात गयी.
दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी.

RSD

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