उस शख्श को क्या कहें जिसकी आँखों में शराब है
दौलत से भरी दुनिया को छोड़ कर जिसे इस गरीब की चाहत है.

ये तू किसके इंतज़ार में दोपहर में बैठा है
इन राहों पे चल के कब कहाँ कोई लौटा है.

जब मैं मोहब्बत में था, तो खुल कर जंग हुई
वो अपने पे आ गयी तो मुझे रुलाने के लिए सबकी बन गयी.
कोई टिक न सका अपने ब्रह्मचर्य के पथ पे
जब वो मेनका, उर्वसी और रम्भा सी अप्सरा बन गयी.

तराशा है जिस जिस्म को मेरे आभूषणों ने
वो छनकाती हैं उन्हें किसी और की बाहों में.

मेरे दर्दे-इश्क़ का कुछ यूँ इलाज हो
टूटती चूड़ियां और दरकती लाज हो.
खली खिड़की और बंद किवाड़ के बीच
जलती एक आलाव हो.

RSD

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