एक पल तेरी आँखों ने जो इशारा कर किया
उम्र भर के लिए मुझे फिर आवारा कर दिया.
दो पल की इस ख़ुशी ने फिर
ताउम्र के लिए हमें तनहा कर दिया।
कितनी मंजिले बनी थी इन लकीरों पे
उन सबसे मेरी राहों को जुदा कर दिया।
मैं लिख रहा हूँ कविता तेरे प्यार में वो बबिता
तू सुनती नहीं तो जग को सूना रहा
मैंने खरीदें चूड़ी-कंगन, तेरे पावों के प्याल
तूने पहने ही नहीं तो जग में बाँट रहा.
एक पल आँख लड़ा के, तू भूल गयी दिल लगा के
तूने पूछा भी नहीं हाले-दिल तो मैं गमे-शब् गुनगुना रहा.
मैंने सोचा था एक घर बसा के, दीवारों पे तुमको सजा के
खिलाऊंगा लिट्टी -चोखा, तू मानी नहीं तो मैं सतुआ खा रहा.
उसने इरादा कर लिया था मुझे बर्बाद करने का
मैं भी बिहारी हूँ तो गोबर, गोइंठा, खप्पर, छप्पर सब चढ़ा गए.
इश्क़ में दुआओं का, दवाओं का, और फरियादों का कोई असर नहीं होता
जानते थे हम ये सब, जानते थे हम ये सब, पर उसकी आँखों में, आदाओं पे सब भुला गए.
धुप में – ना छावं में, मिलो मुझसे गावं में
कभी पनघट, कभी पोखर, कभी खलिहान में.
शहर मज़बूरी मेरी, ना यहाँ मैं किसी के चाह में
प्यार कब पनपा है, सवंरा हैं बंदिशों और घेराव में.
ना दिल्ली, ना महाराष्ट्र में, मिलो तुम हमसे बिहार में.
उम्मीदों के समन्दर को बाँध के निकला हूँ
जब से छोड़ा है गावं, बिहार, बस भटका और सिर्फ भटका हूँ.
RSD