किताबों की दुनिया


जिनको भी मिलीं हैं किताबों की दुनिया
वो ना शहर के रहें, ना सहर के रहें।
जंग रही उनकी सदा अंधेरों से
मगर ना वो रौशनी के रहें , ना चांदनी के रहें।
बहुत दिन तक हम भी इसी गुमान में रहे
पर अंत में ना खुदा के रहें, ना महबूबा के रहें।

RSD

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