पहला प्यार बिहार जैसा


पहला प्यार कैसा होता है
बिहार जैसा।
उजाड़ हो गया जहाँ मेरा पर वही मेरा नशा है
कोई और उजाड़े उसे तो फिर दर्द होता है.
जाने कैसे बाँट लेते हैं लोग माकन और देश को
मैं पूर्वांचल का हूँ, पर वो मिथिलांचल मांगते हैं
तो दर्द होता है.
यूँ ही नहीं कहते हमें, बाबूसाहेब छपरा के
हमारे सीने में बिहार बसता हैं.

तेरी चुनर को मैं सजा न सका
ये तेरी विवशता, तेरी गरीबी नहीं है
ये मेरी नाकामी, मेरी वेवफाई हैं.
फटी, मैली -कुचैली कपड़ों में तू
आज भी मीठी सी शहनाई है.
हस ले ये दुनिया चाहे जितना भी
की ढल गयी तेरी जवानी, और
अब झुर्रिया हैं चेहरे पे
पर मैंने जी और देखि तेरी अंगराई है.

तेरी लचकती कमर पे बिहार मेरा
उलझती नज़र पे छपरा बसा
वादियाँ राजगीर की, वो वक्ष तेरे
विचरता है मन, हर प्रातः जहां।

तेरी जुल्फें सघन, उफनती नदी
अधर तेरे, कोई सोइ नागिन
पटना की प्यारी कचौड़ी गली
तेरी वो नाभि गहरी
भटकता है दिल, हर शाम जहां।

तेरी चाल, सोनपुर का वो मेला
जिससे जलता था लाखों का चूल्हा
वो कटाव, वो कसाव तेरा, गंगा का किनारा
लगती थी नाव मेरी, हर रात जहां।

ना मिली नौकरी, तू छोड़ गयी
जैसे पैसे के लिए छूटा गावं मेरा।
तेरी बाहें मेरा खलिहान
अब कोई और सो रहा है जहां।
तेरी यादें, तेरा चेहरा, बनारस
दिल का चैन, लुटा है जहां।

RSD

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