काली आँखें


हैं जो ये काली आँखें, शरारत करती हैं
बात-बात पे चुपचाप इबादत करती हैं।
कभी कह दें बिना बोले ही सारी दुनिया,
कभी खामोश रहकर भी बगावत करती हैं।

इनमें छुपे हैं कई अधूरे अफ़साने,
जिन्हें पढ़ने की चाह हर दिल में पलती है।
कभी बरसें घटा बनके सावन जैसी,
कभी मुस्का के दिल की सियासत करती हैं।

जब मिल जाएँ किसी अपने की नज़रों से,
तो ये आँखें सजी संजीवनी बन जाती हैं।
और जब रूठ जाएँ ये पलकों के पीछे,
तो हज़ारों रातें सज़ा बन जाती हैं।

RSD

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