<blockquote class=”twitter-tweet”><p lang=”en” dir=”ltr”>In a new <a href=”https://twitter.com/NAR_Open?ref_src=twsrc%5Etfw”>@NAR_Open</a> study, <a href=”https://twitter.com/DanaFarber?ref_src=twsrc%5Etfw”>@DanaFarber</a> researchers led by <a href=”https://twitter.com/meioticdrrive?ref_src=twsrc%5Etfw”>@meioticdrrive</a> reveal how foamy virus (FV) targets DNA based on replication timing and chromatin structure.<br><br>Read more: <a href=”https://t.co/UF4IbcTSGi”>https://t.co/UF4IbcTSGi</a> <a href=”https://t.co/pmw4KXMzXB”>pic.twitter.com/pmw4KXMzXB</a></p>— Dana-Farber News (@DanaFarberNews) <a href=”https://twitter.com/DanaFarberNews/status/1932807537780215958?ref_src=twsrc%5Etfw”>June 11, 2025</a></blockquote> <script async src=”https://platform.twitter.com/widgets.js” charset=”utf-8″></script>
Month: June 2025
बेसकीमती
सब कुछ तो दे दिया खुदा ने औरत को
फिर भी औरत जाने क्या ढूंढती हैं.
हम्मे है लाख कमियां पर ठहर गए तो
फिर कोई कमी नहीं रहती है.
जा मुस्करा ले मेरी बेबसी पे
तेरी मुकर्राहट बेसकीमती हो गयी.
RSD
वो ख़ूबसूरत थी, और मैंने शादी नहीं की
किसी ने पूछा — ज़िंदगी पे क्या ख़्याल है?
मैं मुस्कुराया, धीरे कहा —
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
वो क्रिश्चन थी, मैं हिंदू,
वो तमिलियन, मैं बिहारी।
वो नाज़ुक, छुईमुई सी, पतली छरहरी,
मैं — धूप में तपने वाला, सोने वाला, सतुआ खाने वाला,
उसकी उँगलियाँ किताबों के पन्नों जैसी,
मेरे हाथ — खेत की मिट्टी सने हुए।
कुछ देर ठहरी थी वो मेरी दुनिया में,
बातें- वादे, हज़ार हुईं,
मगर फिर —
एक दिन वो जो मुकर गई।
उसके बाद फिर चाहत किसी की नहीं की।
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।।
न जाने क्या था उसके मन में,
या शायद सब जानकर भी अनजान थी।
मैं वहीं रह गया — अधूरा, खामोश,
किनारों सा हर पल में टूटता रहा, बिखरता रहा
मगर फिर….
यूँ किसी से घंटों वैसी गुफ्तगू नहीं की।
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
वक़्त रह गया जो मेरी हथेलियों में,
उस वक्त में वो मेरी नहीं थी.
ज़माना चुरा ले गया जो, वो राह मेरी थी।
लोग कहते रहे —
“किस्मत थी,”
“तेरी नहीं थी,”
“चल छोड़, आगे बढ़,”
मगर दिल जानता था —
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
RSD
हर लम्हा
ये ज़िन्दगी भी क्या है कि टूटे हैं थोड़ा-थोड़ा हर लम्हा,
ज़िंदा हैं कि क़लम लिखती है बस उसी को हर लम्हा।
चाहा था कि कभी तो सुकून आएगा दिल को,
पर मिलती रही बेताबी की ही सजा हर लम्हा।
आईना भी अब चेहरा देख कर है चुप सा,
बयाँ करता नहीं है मेरे दर्द का किस्सा हर लम्हा।
रिश्तों की किताबें भी अब बोझ लगती हैं,
अधूरी सी कहानी है उनमें छुपा हर लम्हा।
ख्वाबों ने भी अब आंखों से नाता तोड़ लिया,
बस बचा है सहर होने का धोखा हर लम्हा।
चल पड़े हैं सफर में मगर मंज़िलें गुम हैं,
थक कर गिरते हैं फिर संभलते हैं हर लम्हा।
दर्द भी अब अपना सा लगने लगा है,
जैसे कोई अजनबी था बना अपना हर लम्हा।
‘परमित’ लिखता है फिर भी मोहब्बत की बातें,
शायद इसी बहाने बच जाए वजूद हर लम्हा।
RSD
हिज्र
इश्क़ के तमाम रंग फीके पड़ गए
दर्द में दिल को जब मैंने सजाया।
जब तक वो मेरी थी मैंने चूमा जिस्म को
इस हिज्र के बाद, वो बन गया मेरा साया .
उम्मीद का कोई अंत नहीं
जंग में वो दम नहीं।
हार रहा है इश्क़ मेरा
फिर भी है ये यकीन
की वो मिलेगी किसी मोड़ पे एक दिन
बनकर मेरी, बनकर मेरी।
ना दिल रख किसी के नाम का
ना शौक कर किसी जाम का
तन्हाई में तो मांगते हैं सब
सिर्फ जिस्म, और जिस्म हाँ.
दुरी तो सित्तारों में भी है
चाँद भी तनहा है, ये सच है
तो बदनाम क्यों हैं ?
सिर्फ मेरा बिहार हाँ.
RSD