लड़ल नैना त फंस गइल जान
सोलहों श्रृंगार के तू धनबाद कइल।
तहरा के चुननी, समझ केजरीवाल
तू त एकनाथ शिंदे नियर वार कइल.
रहल सुन्दर कश्मीर बदन
ओकरा के पूरा नू बिहार कइल.
हम त सोचनी की ससुराल में राज करेम
तू त सपना हमार झारखण्ड कइल.
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लड़ल नैना त फंस गइल जान
सोलहों श्रृंगार के तू धनबाद कइल।
तहरा के चुननी, समझ केजरीवाल
तू त एकनाथ शिंदे नियर वार कइल.
रहल सुन्दर कश्मीर बदन
ओकरा के पूरा नू बिहार कइल.
हम त सोचनी की ससुराल में राज करेम
तू त सपना हमार झारखण्ड कइल.
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धीरे-धीरे अंगिया के अंगार कइल
राजा, रतिया में जे तू प्यार कइल.
रहल सुन्दर काश्मीर, बदन
ओकरा के पूरा बिहार कइल.
धीरे-धीरे, धीरे गहिर घाव कइल.
पूरा पाके भी, कह तहार मन कहाँ भरल?
दे देहनी आरक्षण, त जंगल राज कइल.
धीरे-धीरे अंगिया के अंगार कइल
धीरे-धीरे, धीरे गहिर घाव कइल.
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ह्रदय को बेंध रही हो तुम जिन नयनो के तीर से
उनमे काजल गढ़ा था मैंने, मधुमास में प्रीत के.
तुम धरा पे बसंत सी अवतरित
होकर आई थी मेरे बाग़ में.
वेणी में मैंने पुष्प जड़े थे, तुम मुस्काई थी साथ में.
मन को मेरे छल रही हो तुम जिस कमर की ताल पे
उसपे पुष्प जड़े थे मैंने, प्रीत के मधुमास में.
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काली तोहार अँखियाँ कमाल कर गइल
धीरे-धीरे, धीरे गहिर घाव कर गइल.
जे नचाइलख सारा बिहार अपना मूँछ पे
वइसन धुरंधर के बेहाल कर गइल.
पातर तोहार कमरिया कमाल कर गइल
धीरे-धीरे, धीरे गहिर घाव कर गइल.
जउन दूआर पे सबके नथनी टूटल
तोहार नथनी पे उ कंगाल हो गइल.
तहार गालिया के तिल कमाल कर गइल
धीरे-धीरे, धीरे गहिर घाव कर गइल.
जे लूट लेलख सारा ज्वार के
जवानी के अइसन रंगदार के
तोहार चोली का बटन बर्बाद कर गइल.
धीरे-धीरे, धीरे गहिर घाव कर गइल.
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श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी
प्रभि बोल दो एक बार हमसे भी.
किसी भी जनम, ये चरण ना छूटे,
मन से मेरे, आपका स्मरण ना मिटे।
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी.
मेरे कृष्णा, मेरे कृष्णा, मेरे कृष्णा जी.
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्रीकृष्ण जी,
आँखों में आंसू, और विनती यही
प्रभु मिल जाओ इस जनम में ही.
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी
जाऊं कहाँ, पुकारूँ किसे,
जब आप ही हो प्यारे, मेरे कृष्णा जी.
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी,
मेरी पीड़ा हर लो मेरे कृष्णा जी.
पापी मैं, इतना पाप कर चुका,
फिर कैसे मिलोगे, मेरे कृष्णा जी?
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी.
माया आँखों पे इतनी चढ़ी है
माधव मैं आपको देख सकता नहीं,.
प्रभु छोड़ना नहीं बीच मझधार में
मेरा आपके सिवा कोई दूजा नहीं
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी.
अभिमान सर पर चढ़ के बैंठा,
प्रभु, मैं आपको देख सकता नहीं।
कैसे पुकारू हे माधव तुम्हे
भक्ति-भाव मुझे आता नहीं,
और ह्रदय अब मेरा सरल नहीं।
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी.
आपके चरण मेरे सारे धाम हैं
प्रभु मुझे उड़ाना नहीं, मुझे उड़ना नहीं।
हे माधव, मुझे किसी और दर का
दाना कभी चुगाना नहीं।
मेरे कृष्णा, मेरे कृष्णा, मेरे कृष्णा जी.
नारी तुम्हीं हो, इस जगत की हाँ जननी
जगत से फिर तुम डरती ही क्यों हो?
मोहब्बत जो बांधे इन पावों में बेड़ियाँ
वो मोहब्बत इन मर्दों से करती ही क्यों हो.
उठों नारी उठकर इन बेड़ियों को तोड़ दो
आखिर मर्दों को छोड़ने से तुम मुकरती ही क्यों हों?
ये जिस्म है जवाला बन जाने के लिए
इस जिस्म को जाम में ढ़ालती ही क्यों हो?
चलो मैंने माना, मैं पा सका ना तुम्हारी मोहब्बत
मोहब्बत को पाना है मंजिल, तुम समझती ही क्यों हो.
मोहब्बत तो है अम्बर में स्वतंत्र उड़ान,
उसे तुम सौदे में बदलती ही क्यों हो?
तुम्हारे ही बल से सृष्टि, और सृष्टि के संचालक
फिर अपनी ही ताक़त को तुम झुठलाती ही क्यों हो?
तुम धरती हो, अंबर हो, जल हो, अग्नि हो,
अपने इन रूपों को तुम छिपाती ही क्यों हो?
सदियों से ढोती चली आ रही हो बोझ,
ममता, अबला, का इतिहास, आखिर तुम बनती ही क्यों हो?
सत्य तुम्हारे स्वर में ही बसता है,
तो मौन बनकर वेदना, तुम सहती ही क्यों हो?
नारी, तुम चाहो तो पर्वत पिघल जाए
फिर मोहब्बत के आंसू तुम बहती ही क्यों हो?
तू चाहे तो चिंगारी से सूरज बना दे,
फिर भी खुद को राख-ख़ाक, तुम समझती ही क्यों हो?
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हद भी नजर कि तुम बांधते हो
पल्लू भी कमर पे तुम ताड़ते हों.
ये क्या है जो तुम तो चाहते हो
मगर हमें चाहने से रोकते हो.
किताबें भी पढ़कर ना टूटीं बेड़ियाँ
हमें बेड़ियों में तुम यूँ बांधते हो.
तुम तो मोहब्बत में नया जिस्म ढूंढों
और शर्म, हाय, लाज हमपे लादते हो.
दीवारें नफ़रत की तुम गढ़ते हो,
सपनों की उड़ानों को तुम तोड़ते हो।
कभी आग बनते, कभी राख करते,
हमारे ही होने को तुम नकारते हो।
हमारे गीतों को तुम मौन करके,
अपनी ज़ुबाँ पे रखते हो।
तुम्हें मोहब्बत में देह चाहिए, फिर
हमारी आत्मा को क्यों बाँधते हो?
तुम्हारी नज़र में हम गुनाहगार ठहरें,
जो पल्लू थोड़ा सरक जाए तो.
तुम्हारे नियम ये, तुम्हारी ही हदें,
हमारी ही साँसों को क्यों तुम कुचलते हो?
सदियों से लाज का बोझ हम ढोएँ,
तुम हर नजर को पढ़ते हो।
कभी बेटी, कभी बहन, कभी पत्नी,
हमारी पहचान को तुम बुनते हो.
अगर चाहत है, तो खुलकर कहो,
अगर इश्क़ है, तो हमें उड़ने दो।
मगर ये दोगलापन छोड़ दो अब,
हमें जीने दो, हमें साँस लेने दो।
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