उठो नारी


नारी तुम्हीं हो, इस जगत की हाँ जननी
जगत से फिर तुम डरती ही क्यों हो?
मोहब्बत जो बांधे इन पावों में बेड़ियाँ
वो मोहब्बत इन मर्दों से करती ही क्यों हो.

उठों नारी उठकर इन बेड़ियों को तोड़ दो
आखिर मर्दों को छोड़ने से तुम मुकरती ही क्यों हों?
ये जिस्म है जवाला बन जाने के लिए
इस जिस्म को जाम में ढ़ालती ही क्यों हो?

चलो मैंने माना, मैं पा सका ना तुम्हारी मोहब्बत
मोहब्बत को पाना है मंजिल, तुम समझती ही क्यों हो.
मोहब्बत तो है अम्बर में स्वतंत्र उड़ान,
उसे तुम सौदे में बदलती ही क्यों हो?

तुम्हारे ही बल से सृष्टि, और सृष्टि के संचालक
फिर अपनी ही ताक़त को तुम झुठलाती ही क्यों हो?
तुम धरती हो, अंबर हो, जल हो, अग्नि हो,
अपने इन रूपों को तुम छिपाती ही क्यों हो?

सदियों से ढोती चली आ रही हो बोझ,
ममता, अबला, का इतिहास, आखिर तुम बनती ही क्यों हो?
सत्य तुम्हारे स्वर में ही बसता है,
तो मौन बनकर वेदना, तुम सहती ही क्यों हो?

नारी, तुम चाहो तो पर्वत पिघल जाए
फिर मोहब्बत के आंसू तुम बहती ही क्यों हो?
तू चाहे तो चिंगारी से सूरज बना दे,
फिर भी खुद को राख-ख़ाक, तुम समझती ही क्यों हो?

RSD

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