बेड़ियों का सच


हद भी नजर कि तुम बांधते हो
पल्लू भी कमर पे तुम ताड़ते हों.
ये क्या है जो तुम तो चाहते हो
मगर हमें चाहने से रोकते हो.

किताबें भी पढ़कर ना टूटीं बेड़ियाँ
हमें बेड़ियों में तुम यूँ बांधते हो.
तुम तो मोहब्बत में नया जिस्म ढूंढों
और शर्म, हाय, लाज हमपे लादते हो.

दीवारें नफ़रत की तुम गढ़ते हो,
सपनों की उड़ानों को तुम तोड़ते हो।
कभी आग बनते, कभी राख करते,
हमारे ही होने को तुम नकारते हो।

हमारे गीतों को तुम मौन करके,
अपनी ज़ुबाँ पे रखते हो।
तुम्हें मोहब्बत में देह चाहिए, फिर
हमारी आत्मा को क्यों बाँधते हो?

तुम्हारी नज़र में हम गुनाहगार ठहरें,
जो पल्लू थोड़ा सरक जाए तो.
तुम्हारे नियम ये, तुम्हारी ही हदें,
हमारी ही साँसों को क्यों तुम कुचलते हो?

सदियों से लाज का बोझ हम ढोएँ,
तुम हर नजर को पढ़ते हो।
कभी बेटी, कभी बहन, कभी पत्नी,
हमारी पहचान को तुम बुनते हो.

अगर चाहत है, तो खुलकर कहो,
अगर इश्क़ है, तो हमें उड़ने दो।
मगर ये दोगलापन छोड़ दो अब,
हमें जीने दो, हमें साँस लेने दो।

RSD

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