ह्रदय को बेंध रही हो तुम जिन नयनो के तीर से
उनमे काजल गढ़ा था मैंने, मधुमास में प्रीत के.
तुम धरा पे बसंत सी अवतरित
होकर आई थी मेरे बाग़ में.
वेणी में मैंने पुष्प जड़े थे, तुम मुस्काई थी साथ में.
मन को मेरे छल रही हो तुम जिस कमर की ताल पे
उसपे पुष्प जड़े थे मैंने, प्रीत के मधुमास में.
RSD