चराग़ और तूफ़ान


उन्हीं राहों को मिली मंज़िल जिन्होंने चिराग़ों को जलाए रखा,
बुलंदियों को पाने तक अपना हौसला बनाए रखा।

आज सत्ता की चाह में हम अपनी मिट्टी तक बेच दें,
वो कैसे राजपूत थे जिन्होंने माटी को ख़ून से भिगोए रखा।

जहाँ सोने के सिक्कों पे बिकते हैं सारे रिश्ते,
वफ़ा के नाम पर किसने दिलों को अब अपना बनाए रखा।

आज के हुस्न वाले इश्क़ को पैसों से तौलते हैं,
वो दिल्ली की तवायफ़ें, जिन्होंने दाग़ के इश्क़ को जिंदा बनाए रखा।

मगरूर था जो ताज पे, मिट्टी में मिल गया,
दौरे-जहाँ में सिर्फ आशिक़ों ने ही नाम-ओ-निशाँ बनाए रखा।

जहाँ औरत बदलती रही अपने वादों के मौसम की तरह,
कुछ दीवानों ने अपनी मोहब्बत को ख़ुदा बनाए रखा।

मक़ाम हासिल किया जिसने सब्र के सहारे,
वही था जिसने तूफ़ानों में भी चराग़ जलाए रखा।

‘धुरंधर’ ये जहाँ अब सियासत का बाज़ार बन चुका,
बस हमने ही ग़ज़ल को मोहब्बत का आईना बनाये रखा।

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किसे देखा है?


किस कलम को देखा है रोज़ी कमाते हुए,
किस शायर को देखा है घर को सजाते (बसाते) हुए।

आज से अच्छी दिल्ली तो दाग़ की थी,
किसी ने सुना है उन्हें छुरा दिल पे चलाते हुए?

सितमगर ने तो बस औरत के जिस्म से खेला/लुटा है,
कहाँ वो ज़ालिम मिला है इश्क़ में सब गँवाते हुए?

बाज़ार-ए-मोहब्बत की सच्चाई बस बेवफाई है
किसी औरत को देखा है यहाँ दिल निभाते हुए।

हमने तो चाहा था इश्क़ को इबादत समझ कर,
किसे देखा है इस राह में ख़ुदा पाते हुए।

हक़ीक़त का चिराग़ किसे रोशनी देता है,
किसे देखा है अँधेरों में चराग़ जलाते हुए।

वफ़ा की किताबें हैं बस काग़ज़ के अफ़साने,
किसे देखा है गरीब की मोहब्बत अपनाते हुए.

सियासत में सब चेहरे नक़ाबों के तले हैं,
किसे देखा है सच बोल के सत्ता पाते हुए.

ग़ुरबत की सड़क पर है इंसानियत भूखी प्यासी,
किसे देखा है रोटी को मोहब्बत में बाँटते हुए।

ज़माना तो दौलत और शोहरत के पीछे है,
किसे देखा है ग़रीब को गले लगाते हुए।

‘धुरंधर’ ये जहाँ झूठ की बाज़ारगाह है,
किसे देखा है सच्चाई को मुस्कराते हुए।

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जुल्म बढ़ गया है ससुराल में


पतिदेव ने चिठ्ठी लिखी, पढ़ ली मेरी सास ने
सखी, जुल्म अब बढ़ गया है मुझपे ससुराल में.
अरे देवर ने कर ली अटखेली, टूट गयी चूड़ी हाथ में
सखी, जुल्म अब बढ़ गया है मुझपे ससुराल में.
एक दिन ननद साथ बैठी थी झूले पे बाजार (बाग़) में
सखी, जुल्म अब बढ़ गया है मुझपे मेरे ससुराल में.
एक दिन मैं निकल गयी बिन घूँघट के द्वार से
सखी, जुल्म अब बढ़ गया है मुझपे मेरे ससुराल में.

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कोई प्यार है


उम्र का पड़ाव था लगा कोई प्यार है
दो-कदम साथ चले, लगा उसका साथ हैं.
धड़कने छलती गयी, और मैं छलता गया
लगा उसका मुस्कराना ही उसकी हाँ है.
मैंने चूड़ी खरीद डाले, उसने भी पहन लिया
लगा उसकी अधरों पे भी जगी कोई प्यास है.
ना उसने हां कहा, ना ही उसने इंकार किया
बस आके मेरी हाथों में अपना निमंत्रण रख दिया।
आंसू थे आँखों में, उसने ख़ुशी का समझ लिया
उस दिन से आज तक दिल ने उसी का इंतज़ार किया।

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मेरा मकसद तो नहीं


मेरे जिस्म की दवा तेरा आगोस तो नहीं
मैंने माँगा है खुदा से जो वो तेरा जिस्म तो नहीं।
मैं तन्हा हूँ मगर, तेरा इंतज़ार तो नहीं
हाँ इंतज़ार में हूँ, मगर वो कोई जिस्म तो नहीं।
मुहे पतझड़ से है प्यार, बसंत की चाह तो नहीं
टूटे पत्ते भा गए, मेरा सिवा कोई उनका तो नहीं।
हाँ देखा था तुझे बड़ी चाव से नजर ने
मैं हाँथ भी बढ़ाया तुम्हे छूने के लिए.
तुझे पाना ही हो, ये मेरा मकसद तो नहीं।

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दिल में सदा बिहार ही रहा


ना दर्द में रहा, ना सफर में रहा,
दिल मेरा जाने किस तरफ में रहा.
ना आहें निकली, ना दुआएं निकली,
मर्ज मेरा यूँ ही हमेसा रहस्य में रहा.
मैं बुलाता रहा, वो छिपती रही,
मेरा चाँद हमेसा घटावों में रहा.
सावन के बादल छा भी गए पर
माटी और बाग़ मेरा सूखा और प्यासा ही रहा.
हूँ किसान के खून से मैं
हल काँधे पे और कुदाल हाथ में रहा.
महफ़िल में तुम्हारे मैं बैठने लगा हूँ
पर दिल में सदा बिहार ही रहा.

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ममता


हैं तारें आसमान के, बेचैन धरती पे आने को
है ममता बस यहीं, प्यार और लाड बरसाने को.
जो कल्पवृक्षः और कामधेनु ले कर बैठें हैं
उनको भी पता है हम पिता की गोद में बैठें हैं.
बात जो आ गयी अभिमन्यु की,
अर्जुन, श्री कृष्णा से मख मोड़ के बैठे हैं.

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