किस कलम को देखा है रोज़ी कमाते हुए,
किस शायर को देखा है घर को सजाते (बसाते) हुए।
आज से अच्छी दिल्ली तो दाग़ की थी,
किसी ने सुना है उन्हें छुरा दिल पे चलाते हुए?
सितमगर ने तो बस औरत के जिस्म से खेला/लुटा है,
कहाँ वो ज़ालिम मिला है इश्क़ में सब गँवाते हुए?
बाज़ार-ए-मोहब्बत की सच्चाई बस बेवफाई है
किसी औरत को देखा है यहाँ दिल निभाते हुए।
हमने तो चाहा था इश्क़ को इबादत समझ कर,
किसे देखा है इस राह में ख़ुदा पाते हुए।
हक़ीक़त का चिराग़ किसे रोशनी देता है,
किसे देखा है अँधेरों में चराग़ जलाते हुए।
वफ़ा की किताबें हैं बस काग़ज़ के अफ़साने,
किसे देखा है गरीब की मोहब्बत अपनाते हुए.
सियासत में सब चेहरे नक़ाबों के तले हैं,
किसे देखा है सच बोल के सत्ता पाते हुए.
ग़ुरबत की सड़क पर है इंसानियत भूखी प्यासी,
किसे देखा है रोटी को मोहब्बत में बाँटते हुए।
ज़माना तो दौलत और शोहरत के पीछे है,
किसे देखा है ग़रीब को गले लगाते हुए।
‘धुरंधर’ ये जहाँ झूठ की बाज़ारगाह है,
किसे देखा है सच्चाई को मुस्कराते हुए।
RSD