चराग़ और तूफ़ान


उन्हीं राहों को मिली मंज़िल जिन्होंने चिराग़ों को जलाए रखा,
बुलंदियों को पाने तक अपना हौसला बनाए रखा।

आज सत्ता की चाह में हम अपनी मिट्टी तक बेच दें,
वो कैसे राजपूत थे जिन्होंने माटी को ख़ून से भिगोए रखा।

जहाँ सोने के सिक्कों पे बिकते हैं सारे रिश्ते,
वफ़ा के नाम पर किसने दिलों को अब अपना बनाए रखा।

आज के हुस्न वाले इश्क़ को पैसों से तौलते हैं,
वो दिल्ली की तवायफ़ें, जिन्होंने दाग़ के इश्क़ को जिंदा बनाए रखा।

मगरूर था जो ताज पे, मिट्टी में मिल गया,
दौरे-जहाँ में सिर्फ आशिक़ों ने ही नाम-ओ-निशाँ बनाए रखा।

जहाँ औरत बदलती रही अपने वादों के मौसम की तरह,
कुछ दीवानों ने अपनी मोहब्बत को ख़ुदा बनाए रखा।

मक़ाम हासिल किया जिसने सब्र के सहारे,
वही था जिसने तूफ़ानों में भी चराग़ जलाए रखा।

‘धुरंधर’ ये जहाँ अब सियासत का बाज़ार बन चुका,
बस हमने ही ग़ज़ल को मोहब्बत का आईना बनाये रखा।

RSD

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