बरसात — 13 अक्टूबर 2025


बरस रहे हो बादल कल ही रात से
क्या बात है, क्यों हो परेशान से?
कोई नहीं है क्या तुम्हें सुनने वाला,
जो बैठ के सुने तुम्हें इत्मीनान से।

बिजली भी है साथ में फिर भी बेचैन हो,
झूम रही हवाओं में भी लिए अश्क आँख में।
दर्द कोई गहरा है जो कह नहीं पा रहे,
या कह रहे हो मगर किसी अनजान से।

मैं सुनूंगा, आ जाओ मेरी खिड़की पे,
भिंगों दो मुझको भी दो-चार बूंदें डाल के।
बस शर्त इतनी सी कि खुशबू मिट्टी की,
तुम्हारी हवाएँ लेके आएँ मेरे गाँव से।

इस रिमझिम में भी कई राज़ छिपे हैं,
जो दिल के किसी कोने में अब तक दबे हैं।
जो तुमने बरसों से लफ़्ज़ों में न कहे हैं,
कहो तो, कह दूँ, उन्हेंअपने गीत में ढाल के।

कभी-कभी थम जाओ मेरे छत पे भी ज़रा,
मैं बना लूँ किसी का चेहरा तुम्हारी बूंदों से।
रात ढले तो बातें हों चाँद की
धीरे-धीरे मिटे प्यास मन के कोनों से।

सुना है जब तुम आते हो कोई याद आता है,
तो पूरी रात बरसो और ले आओ
वो पुरानी सी ठंडक बदन में,
रजाई, माँ की गोद सी लगे इस बरसात में।

अगर थक गए हो तो यहीं रुक जाओ,
मेरे शब्दों में कुछ पल को ठहर जाओ।
कल जब सूरज निकले मुस्कान लिए,
तो कह देना – “ अगली बार बादल आएंगे गाँव से।”

RSD

Leave a comment