निर्मोही-बिद्रोही, मैं बिहारी हूँ


निर्मोही-बिद्रोही, मैं बिहारी हूँ
मेरे नस-नस में है रस विरह का।
छपरा का बाबूसाहेब, मैं
मदमस्त-अलमस्त खिलाड़ी हूँ।
मेरे नस-नस में है रस विरह का।

माटी के गीत गाता-सुनाता,
भोर में गाता, संझा में गाता,
हर ठेहुनी पे जग का गाता,
मैं भटकता-बंजारा-स्वाभिमानी हूँ।
मेरे नस-नस में है रस विरह का।

पनघट पे बैठा प्यासा पुजारी,
घड़ा भरे बिना भी आनंदित भारी,
मिट्टी में मीत, नदी में नारी,
मैं तन्मय-तपस्वी संसारी हूँ।
मेरे नस-नस में है रस विरह का।

लिट्टी की आँच में जो तपता,
आम्र-छाँव में जब भी रमता,
सावन में झूमे, भादो में गाता,
मैं लोक की कविता का अधिकारी हूँ।
मेरे नस-नस में है रस विरह का।

नागार्जुन की हँसी में रहता,
दिनकर के सूरज-सा जलता,
फूलों में, काँटों में पलता,
मैं मिट्टी की भाषा का उजियारी हूँ।
मेरे नस-नस में है रस विरह का।

RSD

Leave a comment