कू-ए-यार में


किसकी मोहब्बत सजी है नसीब की राह में,
यार ज़मीन भी दे, जिस्म भी दे—तो क्या?
बेवफ़ाई ही तो रहती है कू-ए-यार में।

दिल ने तलाश की थी सुकूँ उसकी आगोस में,
घाव ही घाव मिले हमको कू-ए-यार में।

हमने भी चाहा था उम्र गुजरे उसकी बांह में,
नाम तक ना रहा अपना अब कू-ए-यार में।

रातें गुज़र गईं उसकी चाह की याद में,
ख़्वाब टूटते रहे चुपके चुपके हिसार में।

जिस्म और जाँ भी मिले हों तो क्या हुआ ऐ दिल,
वफ़ा कभी नहीं मिलती कू-ए-यार में।

हम तो खुश थे उसके झूठे इकरार में,
अब नाम भी कोई याद करता नहीं कू-ए-यार में।

RSD

Inspired by the Sher, “कितना है बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में”, this is my reply to it.

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