मिला जो समंदर, वो बेचैन बहुत था
मैं अविवाहित और वो तन्हा बहुत था.
हजारों दरियाएँ बाहों में सिमटी
मगर रूह में उसके प्यास बहुत था.
मेरी मुस्कराहट के पीछे कई राज थे
और अपनी लहरों के नीचे वो छुपाये दर्द बहुत था.
मिला जो समंदर, वो बेचैन बहुत था
मैं अविवाहित और उसमे दर्द बहुत था.
मुझे शौक जिन लबों का था
उन लबों पे जहर बहुत था.
मनाने में जिसको सदियाँ गुजर गयीं
बाल पाक गए, गाल धंस गए, दांत टूट गए
वो माना भी तब, जब मैं बूढ़ा बहुत था.
जिंदगी में जितने भी गम थे वो उसकी आँखों से थे
और उसकी आँखों में बेहयाई बहुत था.
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