बिजली बन गयी है


तू अब ऐसी हसीं बन गयी है
की किसी की जमीन बन गयी है
बादल बरसे भी तो अब कहाँ
तू उनमे छुपी बिजली बन गयी है.

जेठ की दोपहरी में बरगद की छाया
तू वही ठंडी छाँह बन गयी है.
प्यास से दहकते अधरों के लिए
शीतल, सरिता बन गयी है.
आईने भी दरक रहे हैं तेरे कटाव पे

RSD

Leave a comment