समंदर


समंदर का शौक रखते हैं
सिंकदर से बेख़ौफ़ रहते हैं.
इस शहर में ऐसे भी लोग हैं
जो इश्क़ में तन्हा रहते हैं.

Rifle Singh Dhurandhar

फूल


जहाँ दर्द मिले दिल को उस दर पे नहीं जाना
बहुत धोखा है इश्क़ में, ये धोखा तुम नहीं खाना।
जो फूल खिल रहे हैं, मुरझा जाएंगे एक दिन
बिना खिले ही तुम मुरझा नहीं जाना।
माना की लम्बी है बहुत, अँधेरी ये रात
घबराकर कहीं तुम कोई ठोकर नहीं खाना।
बहुत हंस कर मिलते है अब लोग अब
ऐसे लोग भले नहीं होते
तुम ऐसे लोगो के गले लग नहीं जाना।
कट जाएगा ये भी वक्त तन्हाई से भरा
रिश्तों में दरार नहीं लाना।

Rifle Singh Dhurnadhar

मैं भी नीलकंठ बनूंगा


गहन अध्ययन कर के विद्वान् बनूंगा
हे शिव मेरे, आशीर्वाद दो मुझे
की अब मैं भी महान बनूंगा।
अभी बालक हूँ, बालपन में भटकता हूँ
हे शिव मेरे, आशीर्वाद दो मुझे
मैं भी भगीरथ बनूंगा।

तुम त्रिकाल हो, त्रिपुरारी हो
तुम अनंत तक के विस्तार में
तुम ही गंगा, तुम्ही काशी
तुम जीवन की हर एक धार में
हे शिव मेरे, आशीर्वाद दो मुझे
विषपान कर मैं भी नीलकंठ बनूंगा।

Rifle Singh Dhurandhar

मेरा भोला तो भंडारी है


जो सर्वविदित, सर्वव्यापी है
मेरे ह्रदय में स्थापित है.
जो गंगा, और काशी है
भांग-धतूरा, कैलासवासी है.
मेरा भोला तो भंडारी है
त्रिलोकी-त्रिपुरारी है.

Rifle Singh Dhurandhar

भाँग माँगता हूँ


ना स्वर्ग माँगता हूँ, ना मोक्ष माँगता हूँ
भोलेनाथ तुम हो हमारे, बस भाँग माँगता हूँ.
सोया नहीं कई रात से मैं
तेरे दर्शन का अभिलाषी, तेरा नाम जपता हूँ.

Rifle Singh Dhurandhar

वो भक्त है महाकाल का


पुराणों में लिखा एक नाम है
बस मेरे भोलेनाथ का.
जिसे भय ना मायाजाल का
वो भक्त है महाकाल का.

शिव मेरे हैं, शिव मेरे
शिव से मेरा नाता है.
मैं क्या सम्भालूं खुद को?
जब स्वयं शिव मेरा रखवाला है.
स्वयं विराजे है कैलाश पे जो
पर सब पे जिसका ध्यान हाँ.

जिसे भय ना मायाजाल का
वो भक्त है महाकाल का.
जो नित करे विषपान हाँ
वो भक्त है महाकाल का.
जिसे अमृत से प्यारा भाँग हाँ
वो भक्त है महाकाल का.

Rifle Singh Dhurandhar

धोबन ताहर जोबन -3


छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
चाहे छुप ल, या कतनो तेल मल ल
अंग – अंग पे ताहार आज दिहन निशानी।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।

साल भर से चल अ तारु मटक-मटक के
हर अ तारु दिल सबके नयना के चटक से
तहरा नस – नस में आज भाँग घोलाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।

चाहे कूद ल, चाहे फाँद ल
चुनर -चोली आज ताहार दुनो रंगाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।

कमरिया पे अपना हिला व् तारुन छपरा
सुगवा फाँस अ तारु लहरा के जोबना
बीच छपरा में आज तहार जोबना रंगाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।

Rifle Singh Dhurandhar

होली


होली में आप रहती और मैं रंगता
जवानी का नशा बिना भाँग के ही चढ़ता।
भींगती तेरी चोली मेरे रंग से
और जोबन पे तेरे मेरा रंग चढ़ता।

Rifle Singh Dhurandhar

परिंदा बेबस जिंदगी में


मैं तो परिंदा बेबस जिंदगी में
क्या सुबहा, क्या शाम मेरी?
उड़ता हूँ तो धरती छीन जाती
लौटता हूँ तो आसमा, कहाँ मेरी।

Rifle Singh Dhurandhar

हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ


हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
कई जुल्म की आँधिया गुजरी हैं इन राहों से-२
पर हार बार जख्म तेरे
पर हार बार जख्म मैं तेरे नैंनो से खाता हूँ.
और क्या मिटा दूँ दिल से यादे ए जमाना?
मैं क्या मिटा दूँ दिल से यादे ए जमाना?
मैं खुद को मिटाने की ही
मैं खुद को मिटाने की ही हर बार चल रखता हूँ.
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.

Rifle Singh Dhurandhar