श्री कृष्णा


श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी
प्रभि बोल दो एक बार हमसे भी.
किसी भी जनम, ये चरण ना छूटे,
मन से मेरे, आपका स्मरण ना मिटे।
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी.
मेरे कृष्णा, मेरे कृष्णा, मेरे कृष्णा जी.

श्री कृष्णा


श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्रीकृष्ण जी,
आँखों में आंसू, और विनती यही
प्रभु मिल जाओ इस जनम में ही.
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी
जाऊं कहाँ, पुकारूँ किसे,
जब आप ही हो प्यारे, मेरे कृष्णा जी.

श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी,
मेरी पीड़ा हर लो मेरे कृष्णा जी.
पापी मैं, इतना पाप कर चुका,
फिर कैसे मिलोगे, मेरे कृष्णा जी?
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी.

माया आँखों पे इतनी चढ़ी है
माधव मैं आपको देख सकता नहीं,.
प्रभु छोड़ना नहीं बीच मझधार में
मेरा आपके सिवा कोई दूजा नहीं
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी.

अभिमान सर पर चढ़ के बैंठा,
प्रभु, मैं आपको देख सकता नहीं।
कैसे पुकारू हे माधव तुम्हे
भक्ति-भाव मुझे आता नहीं,
और ह्रदय अब मेरा सरल नहीं।
श्री कृष्णा, श्री कृष्णा, श्री कृष्णा जी.

आपके चरण मेरे सारे धाम हैं
प्रभु मुझे उड़ाना नहीं, मुझे उड़ना नहीं।
हे माधव, मुझे किसी और दर का
दाना कभी चुगाना नहीं।
मेरे कृष्णा, मेरे कृष्णा, मेरे कृष्णा जी.

उठो नारी


नारी तुम्हीं हो, इस जगत की हाँ जननी
जगत से फिर तुम डरती ही क्यों हो?
मोहब्बत जो बांधे इन पावों में बेड़ियाँ
वो मोहब्बत इन मर्दों से करती ही क्यों हो.

उठों नारी उठकर इन बेड़ियों को तोड़ दो
आखिर मर्दों को छोड़ने से तुम मुकरती ही क्यों हों?
ये जिस्म है जवाला बन जाने के लिए
इस जिस्म को जाम में ढ़ालती ही क्यों हो?

चलो मैंने माना, मैं पा सका ना तुम्हारी मोहब्बत
मोहब्बत को पाना है मंजिल, तुम समझती ही क्यों हो.
मोहब्बत तो है अम्बर में स्वतंत्र उड़ान,
उसे तुम सौदे में बदलती ही क्यों हो?

तुम्हारे ही बल से सृष्टि, और सृष्टि के संचालक
फिर अपनी ही ताक़त को तुम झुठलाती ही क्यों हो?
तुम धरती हो, अंबर हो, जल हो, अग्नि हो,
अपने इन रूपों को तुम छिपाती ही क्यों हो?

सदियों से ढोती चली आ रही हो बोझ,
ममता, अबला, का इतिहास, आखिर तुम बनती ही क्यों हो?
सत्य तुम्हारे स्वर में ही बसता है,
तो मौन बनकर वेदना, तुम सहती ही क्यों हो?

नारी, तुम चाहो तो पर्वत पिघल जाए
फिर मोहब्बत के आंसू तुम बहती ही क्यों हो?
तू चाहे तो चिंगारी से सूरज बना दे,
फिर भी खुद को राख-ख़ाक, तुम समझती ही क्यों हो?

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बेड़ियों का सच


हद भी नजर कि तुम बांधते हो
पल्लू भी कमर पे तुम ताड़ते हों.
ये क्या है जो तुम तो चाहते हो
मगर हमें चाहने से रोकते हो.

किताबें भी पढ़कर ना टूटीं बेड़ियाँ
हमें बेड़ियों में तुम यूँ बांधते हो.
तुम तो मोहब्बत में नया जिस्म ढूंढों
और शर्म, हाय, लाज हमपे लादते हो.

दीवारें नफ़रत की तुम गढ़ते हो,
सपनों की उड़ानों को तुम तोड़ते हो।
कभी आग बनते, कभी राख करते,
हमारे ही होने को तुम नकारते हो।

हमारे गीतों को तुम मौन करके,
अपनी ज़ुबाँ पे रखते हो।
तुम्हें मोहब्बत में देह चाहिए, फिर
हमारी आत्मा को क्यों बाँधते हो?

तुम्हारी नज़र में हम गुनाहगार ठहरें,
जो पल्लू थोड़ा सरक जाए तो.
तुम्हारे नियम ये, तुम्हारी ही हदें,
हमारी ही साँसों को क्यों तुम कुचलते हो?

सदियों से लाज का बोझ हम ढोएँ,
तुम हर नजर को पढ़ते हो।
कभी बेटी, कभी बहन, कभी पत्नी,
हमारी पहचान को तुम बुनते हो.

अगर चाहत है, तो खुलकर कहो,
अगर इश्क़ है, तो हमें उड़ने दो।
मगर ये दोगलापन छोड़ दो अब,
हमें जीने दो, हमें साँस लेने दो।

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बदलते रिश्ते


जो रिश्ते बदलते हैं हवाओं के झोंकों से,
वो कहाँ फलदार वृक्ष बनते हैं.
ना जेड गहरी, ना शाखाओं में ताकत,
वो तो मौसम के साथ ही ढहते हैं.

रिश्ते तो वो हैं जो आँधियों से उलझते हैं,
हर तूफ़ान में और भी मजबूत बनते हैं.
वो विश्वास की मिटटी में पलते हैं,
सहनशीलता की खाद से फलते हैं.

वक्त चाहे जितनी भी धूप दे,
वो छाँव बांके साथ चलते हैं.
ना टूटते हैं, ना झुकते हैं,
बस हर मोड़ पे ने रंग खिलते हैं.

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कवि


ए कवि, तेरे चेहरे पे
एक ग़ज़ब का नूर है।
तू ग़रीब, पर तेरी हस्ती बेजोड़ है।
एक छोटी-सी मुस्कान पे हुस्न के
तूने लिखी कितनी अदाओं की दास्ताँ।
आज ज़माने में हर तरफ़ बस
बिक रहा है सजने का सामान।

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<blockquote class=”twitter-tweet”><p lang=”en” dir=”ltr”>In a new <a href=”https://twitter.com/NAR_Open?ref_src=twsrc%5Etfw”>@NAR_Open</a&gt; study, <a href=”https://twitter.com/DanaFarber?ref_src=twsrc%5Etfw”>@DanaFarber</a&gt; researchers led by <a href=”https://twitter.com/meioticdrrive?ref_src=twsrc%5Etfw”>@meioticdrrive</a&gt; reveal how foamy virus (FV) targets DNA based on replication timing and chromatin structure.<br><br>Read more: <a href=”https://t.co/UF4IbcTSGi”>https://t.co/UF4IbcTSGi</a&gt; <a href=”https://t.co/pmw4KXMzXB”>pic.twitter.com/pmw4KXMzXB</a></p>&mdash; Dana-Farber News (@DanaFarberNews) <a href=”https://twitter.com/DanaFarberNews/status/1932807537780215958?ref_src=twsrc%5Etfw”>June 11, 2025</a></blockquote> <script async src=”https://platform.twitter.com/widgets.js&#8221; charset=”utf-8″></script>

बेसकीमती


सब कुछ तो दे दिया खुदा ने औरत को
फिर भी औरत जाने क्या ढूंढती हैं.
हम्मे है लाख कमियां पर ठहर गए तो
फिर कोई कमी नहीं रहती है.

जा मुस्करा ले मेरी बेबसी पे
तेरी मुकर्राहट बेसकीमती हो गयी.

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वो ख़ूबसूरत थी, और मैंने शादी नहीं की


किसी ने पूछा — ज़िंदगी पे क्या ख़्याल है?
मैं मुस्कुराया, धीरे कहा —
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
वो क्रिश्चन थी, मैं हिंदू,
वो तमिलियन, मैं बिहारी।
वो नाज़ुक, छुईमुई सी, पतली छरहरी,
मैं — धूप में तपने वाला, सोने वाला, सतुआ खाने वाला,
उसकी उँगलियाँ किताबों के पन्नों जैसी,
मेरे हाथ — खेत की मिट्टी सने हुए।
कुछ देर ठहरी थी वो मेरी दुनिया में,
बातें- वादे, हज़ार हुईं,
मगर फिर —
एक दिन वो जो मुकर गई।
उसके बाद फिर चाहत किसी की नहीं की।
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।।
न जाने क्या था उसके मन में,
या शायद सब जानकर भी अनजान थी।
मैं वहीं रह गया — अधूरा, खामोश,
किनारों सा हर पल में टूटता रहा, बिखरता रहा
मगर फिर….
यूँ किसी से घंटों वैसी गुफ्तगू नहीं की।
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
वक़्त रह गया जो मेरी हथेलियों में,
उस वक्त में वो मेरी नहीं थी.
ज़माना चुरा ले गया जो, वो राह मेरी थी।
लोग कहते रहे —
“किस्मत थी,”
“तेरी नहीं थी,”
“चल छोड़, आगे बढ़,”
मगर दिल जानता था —
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।

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हर लम्हा


ये ज़िन्दगी भी क्या है कि टूटे हैं थोड़ा-थोड़ा हर लम्हा,
ज़िंदा हैं कि क़लम लिखती है बस उसी को हर लम्हा।

चाहा था कि कभी तो सुकून आएगा दिल को,
पर मिलती रही बेताबी की ही सजा हर लम्हा।

आईना भी अब चेहरा देख कर है चुप सा,
बयाँ करता नहीं है मेरे दर्द का किस्सा हर लम्हा।

रिश्तों की किताबें भी अब बोझ लगती हैं,
अधूरी सी कहानी है उनमें छुपा हर लम्हा।

ख्वाबों ने भी अब आंखों से नाता तोड़ लिया,
बस बचा है सहर होने का धोखा हर लम्हा।

चल पड़े हैं सफर में मगर मंज़िलें गुम हैं,
थक कर गिरते हैं फिर संभलते हैं हर लम्हा।

दर्द भी अब अपना सा लगने लगा है,
जैसे कोई अजनबी था बना अपना हर लम्हा।

‘परमित’ लिखता है फिर भी मोहब्बत की बातें,
शायद इसी बहाने बच जाए वजूद हर लम्हा।

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