ये तेरा मोहल्ला है


जितना भी प्यासा हूँ मैं
ये तेरी नजरों का साया है.
लड़ता हूँ पेंच मैं भी बहुत
मगर ये तेरा मोहल्ला है.

क्या संभालोगे खुद को तुम
जवानी में बहुत नशा है.
इस उम्र में कब कहाँ किसी ने?
कोई घर बसाया है.

परमीत सिंह धुरंधर

गरल सहज है


एक परम है, एक ही सत्य है
शिव के आगे समस्त शुन्य है.
रंग – तरंग के सब हैं प्यासे
बस योगी के कंठ में गरल सहज है.
इस छोर से उस छोर तक
ना आदि, ना इसका कोई अंत है.
धूम मचाती चली थी गंगा
अब योगी के जाटवों में घर है.
उसी योगी के चरण में मैं हूँ
बस यही चरण मेरा जीवन है.

परमीत सिंह धुरंधर

ये वस्त्र अब दरिंदे


ये प्रेम की वादियाँ
ये रातों के शिकंजे।
ये जवानी का दौर
और ये तेज होते पंजें।

धमनियों में दौरने लगा है
अब लहू कुछ यूँ
की जिस्म को लगते हैं
ये वस्त्र अब दरिंदे।

तुम्हारी बाहों में आकार
यूँ आजाद होने का एहसास है
जैसे आसमा के तले
पंख पसारे परिंदे।

परमीत सिंह धुरंधर

तुम मिलो तो सही


मुस्करा – मुस्करा के शर्मा रही हूँ
तुम मिलो तो सही – २
शर्मा – शर्मा के मुस्कराऊंगी।

अभी तो बहके हैं मेरे कदम
तुम मिलो तो सही – २
संवर – संवर के तुम्हे बहका दूंगीं।

चलने लगी हूँ मैं ढलका के दुपट्टा
तुम मिलो तो सही – २
उड़ा – उड़ा के दुपट्टा चलने लगूंगी।

सारी रात देखती रहती हूँ मैं आईना
तुम मिलो तो सही – २
सारी रात बस तुम्हे देखती रहूंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

बिखरापन


रातों में सूनापन
दिन में अधूरापन
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा दीवानापन?

साँसों में प्यास
आँखों में ख्वाब
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा बंजारापन?

किताबों में उसका चेहरा
राहों में उसका दुप्पटा
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा आवारापन?

जब दिल ही हो बेवफा
तो शिकायत किसे करें
ए जिंदगी अब तू बता
ये कैसा बिखरापन?

परमीत सिंह धुरंधर

जाम


मासूम बन कर जिसने दिल धड़काया,
कास साकी बनकर एक जाम चखा दे.

परमीत सिंह धुरंधर

प्यास


तुमसे मोहब्बत में बड़ी प्यास मिलती है
तू तो उड़ जाता है, संग बस तन्हाई रहती है.

परमीत सिंह धुरंधर

झूठे इंतजार में


पीता बहुत हूँ मैं तेरे नाम पे
जिन्दा हूँ अब तक बस तेरे आस में.

पता है की तुम अब कभी ना लौटोगे
पर मजा बहुत है इस झूठे इंतजार में.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भगीरथ बनूँगा क्या?


धरा पे मैं फिर से
कोई भगीरथ बनूँगा क्या?
मेरे लिए हे शिव,
आप अपनी जटायें खोलेंगे क्या?

जब मन भय से ग्रस्त हो
कर्म पे बढ़ा अटल हो
मैं पुकारूँ,
तो हे शिव आप मेरे लिए आवोगे क्या?

मैं छोडूंगा नहीं हे शिव चरण तुम्हारे
तुम सुनो, ना सुनो,
रहूँगा तुम्हे पुकारते
मुझे यूँ आँखों की धारा में
हे शिव डूबता छोड़ोगे क्या?

परमीत सिंह धुरंधर

हक़


ना रखा कर रुख पे यूँ पर्दा मेरी जान
चाँद के दीदार का हक़ हमें भी है.

परमीत सिंह धुरंधर