मेरी मोहब्बत का समंदर
बस पिता के नाम से आरम्भ
और पिता के नाम पे
जिसका अंत होता है.
जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में
अनंत तक शिव, शिव
और बस शिव का नाम होता है.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी मोहब्बत का समंदर
बस पिता के नाम से आरम्भ
और पिता के नाम पे
जिसका अंत होता है.
जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में
अनंत तक शिव, शिव
और बस शिव का नाम होता है.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे नैनों के बस दो तीर चले थे
और लोट गया चरणों में वो सिकंदर।
सुना था बड़ा वीर है Crassa
समझता है जो खुद को कलंदर।
बस चोली के दो बटन ही खोले थे
और फंस गया वो छपरा का धुरंधर।
परमीत सिंह धुरंधर
वसुंधरा पे वीर वही,
जो नित्य – नया प्रमाण दे.
हिन्द की इस धरती पे,
नरेंद्र फिर तुम्हारा राज हो.
एक नए युग का उदय हुआ,
जब नरसिंह तख़्त पे विराज हुए.
जागी फिर सोइ भारत की आत्मा
जब नरेंद्र तुम दहाड़ उठे.
हिन्द की इस धरती पे
फिर से वही दहाड़ हो.
हिन्द की इस धरती पे,
नरेंद्र फिर तुम्हारा राज हो.
परमीत सिंह धुरंधर
सरहदों को पता ही न चला
सितमगर, सितम कर गया.
मैंने तो कस कर बाँधी थी चोली
हरजाई जाने कैसे फिर भी रंग डाल गया.
सखी, अब ना खेलने जाउंगी
होली छपरा के धुरंधर से.
निर्मोही तन ही नहीं
मेरा मन भी रंग गया.
परमीत सिंह धुरंधर
एक टक्कर तो अब मारना होगा
जानता हूँ जिंदगी
ये फिर एक जंग की शुरुआत है
पर मुड़ने से अच्छा अंत तक लड़ना होगा।
परमीत सिंह धुरंधर
आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.
तुम मुझको मोहन कहना
कहूंगा राधा तुमको मैं.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.
थोड़ा दबा देना तुम
पाँव माँ का रातों में.
ख्याल रखूंगा जीवन भर
मैं बढ़कर अपनी साँसों से.
आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.
परमीत सिंह धुरंधर
तन्हा – तन्हा मेरी जवानी पे
चोली भी एक बोझ है.
सखी, पोखर के इस पानी में
कहाँ मिटता जोवन का ताप है?
कोई भिजा दे संदेसा
उस अनाड़ी, निर्मोही, वैरागी Crassa को
उसकी जोगन पनघट पे
आज भी देखती उसकी राह है.
परमीत सिंह धुरंधर
हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जिसके लाल धुरंधर कहलाते है.
हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जो होंसलो से अपने बाँध, समंदर लेते हैं.
हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जहाँ के बूढ़े भी विद्रोही बन जाते हैं.
हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जहाँ के साधू छपरहिया कहके भूत भगाते है.
हम धरती की उस मिट्टी से आते हैं
जहाँ गुरु – गोविन्द सिंह जी धर्म की बिगुल बजाते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
खूबसूरत जिस्म पे जवानी का नशा
सखी, कटती नहीं रातें अब तो बालम बिना।
आँखों का काजल सुलगता है पूरी रात
जैसे जलता है मेरे कमरे में दिया।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरा वक्त तेरी बाहों में कुछ इस कदर फिसला
देख रह गया है मेरी किस्मत में बस अँधेरा।
परमीत सिंह धुरंधर