मेरा संघर्ष भी जारी है


प्रयास है जमाने का,
हमको मिटाने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
हर गम में मुस्कराने की.
अकेला ही खड़ा हूँ,
एक दिन तो गिरना है.
पर अपनी भी चेष्टा हैं,
सबको झुठलाने की.
बादलों ने मुख मोड़ा है,
हवाओं ने रुख बदला है.
सब विरुद्ध में हैं खड़े,
पर माँ संग में है लेके,
दुवाओं की झोली।
प्रयास हैं लहरों का,
हमको उखारने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
अपने हर निशाँ को बचाने की.
प्रयास है जमाने का,
हमको मिटाने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
हर गम में मुस्कराने की.

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ रातों को रोता हैं,
हुस्न के पास तो जमाना है मुस्कराने को.
सोचो, उस माँ पे क्या गुजरती होगी,
जिसका बेटा कमाता है, मयखाने में लुटाने को.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


हम जिस तहजीब की तरफ बढ़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ महबूब तो कई हैं, सर्द रातों में,
जिस्म को सहलाने को.
मगर, हम जिस माटी को छोड़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ माँ आज भी अकेली है, राह देखती,
हमारे लौट आने को.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


वो करती है गुजरा, थाली में बचे चाँद चावल के दानें से.
माँ तो मात देती भूख को भी, बस बेटे के मुस्कराने से.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


तेरी बाहों में सरकते-सरकते,
सुबह से शाम हो गयी.
अब भूख लगी है मुझे,
माँ की फिर याद आ गयी.
तेरे तन की खुसबू ,
भी अब मीठी नहीं लगती।
वो लड्डू मेरी माँ के हाथों की,
फिर से मुझे याद आ गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


माँ,
ईस्वर का रूप है.
माँ,
सर्द मौसम में घूप है.
माँ है,
तो मीठी है भूख.
माँ,
मिठाई का संदूक है.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


मैं अपनी माँ की चरणों को,
गंगा समझता हूँ,
मुझे धर्म से क्या लेना देना,
मैं तो रोज ये तीर्थ करता हूँ.
मैं अपनी माँ की बोली को,
गीता समझता हूँ.
मुझे वेद-पाठ से क्या लेना देना,
मैं तो ये ही कर्म रोज करता हूँ.
मैं तो अपनी माँ के हाथों के खाने को,
प्रसाद समझता हूँ,
मुझे कथा-वाचन से क्या लेना देना,
मैं तो रोज ये ही पुण्य कमाता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

दूध


रफ़्तार मेरी बढ़ती जा रही है,
पर सांस है की उखड़ती नहीं है.
जाने माँ ने कैसे दूध पिलाया है,
दुश्मनो के बीच में भी,
मेरी आवाज दबती नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


तस्वीरें खुदा की भी सजने लगी हैं,
जब से मेरी माँ मुस्कराने लगी है.
बहारों का तो पता नहीं,
पर आँगन में मेरे तितलियाँ उड़ने लगी है.
वो ही सूरज की किरणे, तन को जलती हैं,
वो ही पसीने की बुँदे, तन को भिगोती है.
मगर मधुर हवाएँ अब चलने लगी हैं,
जब से मेरी माँ मुस्कराने लगी है.

परमीत सिंह धुरंधर