मोहब्बत की,
बस आरजू रखतें हैं.
हम आज भी,
अपने सीने पे काबू रखते हैं.
गुजरती हैं कई जसलीन,
मेरी गलियों से रोज.
करीब जाके भी,
हम उनके दुप्पटे से,
एक दुरी रखते हैं.
हारें हैं जिस हुस्न से,
इस खेल में कई सबरजीत यहाँ।
वो पर्दानशीं भी,
इन राहों में,
बस परमीत से खौफ रखते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर