बात वजूदों की नहीं,
बात वसूलों की है,
बात खंडहरों की नहीं,
बात इमारतों की है,
बात कंचे खेलते हाथों की नहीं,
बात बेरोजगारों की है,
और बात जवानी ढकती दुप्पट्टे की नहीं,
बात तो तिल – तिल सिसकती जवानी की है,
बात अब जात-धर्म की नहीं,
बात अब हमारे और आपके घरों की है.
We need to change the society which is not able to erase the discrimination among us.
परमीत सिंह धुरंधर