बात वसूलों की है


बात वजूदों  की  नहीं,
बात  वसूलों  की  है,
बात  खंडहरों  की नहीं,
बात  इमारतों  की  है,
बात  कंचे  खेलते  हाथों  की  नहीं,
बात  बेरोजगारों  की  है,
और  बात  जवानी  ढकती  दुप्पट्टे  की  नहीं,
बात  तो  तिल – तिल  सिसकती  जवानी  की  है,
बात  अब  जात-धर्म  की  नहीं,
बात  अब  हमारे  और  आपके  घरों  की है.

We need to change the society which is not able to erase the discrimination among us.

परमीत सिंह धुरंधर

मजा : मौत तक प्रयास में है


नशा जीत में नहीं,
जंग में है.
सागर की लहरो में नहीं,
मजधार में है.
लड़ना है जिंदगी में,
चारो तरफ से फंस के.
तैरना है सागर को,
मजधार में डूब के.
जोश सागर के पार जाने या,
पहाड़ की छोटी पे चढ़ने में नहीं,
मौत तक प्रयास में है.
मजा लहूँ के बहने में नहीं,
उसके रिसने में है.
नशा तलवार की धार में नहीं,
उसके टकराव में है,
उसकी आवाज में है.

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन हो तो शिव सा


जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.
मैं चखुं बस विष को,
जग को अमृत-पान दूँ.
अवघड कहे जग मुझे,
या भभूत-धारी।
या फिर योगी बन के,
मैं भटकता रहूँ।
पर भगीरथ के एक पुकार पे,
मैं प्रलय को बाँध दूँ.
जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

बिखरना है जिंदगी


बिखरना है जिंदगी इस कदर जमाने में,
की जर्रे – जर्रे में खुशबु रहे.

परमीत सिंह धुरंधर

स्वाभिमान का दीप


आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।
देव नहीं तुम,
जो रस का भोग हो।
ना दानव हो तुम,
जो दुष्ट तुम बनो।
मानव हो,
मृत्यु से तुम बंधे।
तो साँसों में,
स्वाभिमान का दीप,
जलाइए।
आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।
इस धरा पे,
हर दुःख,
तुम्हारे लिए।
इन राहों की,
हर पीड़ा,
सिर्फ तुम्हारे लिए।
मगर,
जवानी है तुमको मिली,
तो हिमालय से,
टकराइए।
आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।

परमीत सिंह धुरंधर

मैं तब भी लड़ूंगा


जहाँ जवानी का एहसास न हो,
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
आहे भरने की न फुर्सत हो,
ना शिकायत के शब्द गढ़ने की.
जहाँ जिस्म को सावन का,
मन को प्रियतमा का एहसास न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
पग थक गए हो, पर पथ ख़त्म न हो.
आँखे मूंद रही हो, पर मंजिल न हो.
तन से रिस्ते खून को भी बहने से,
रोकने का जब समय न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
ह्रदय में हुंकार तो उठे, पर
आँखों से बहे भी ना बन के धारा।
जब अपनी ही साँसे बोझ लगे,
और कोई न हो सहारा।
जब मेरे बस में ही मेरा वक्त न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
मैं तब भी आगे बढूंगा,
मैं तब भी चलूँगा।
मैं तब भी लड़ूंगा,
ऐसी कोई ललकार तो हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
जहाँ जवानी का एहसास न हो,
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.

परमीत सिंह धुरंधर

सितमगर


सितम बहुत हुई, ए सितमगर,
अब लड़ेंगे हम.
भय, डर कुछ भी नहीं है,
अब कोई समझौता नहीं करेंगे हम.

परमीत सिंह धुरंधर

चुनौती


रौशनी करो,
दूसरों की जंदगी में.
तभी दुःख मिटेगा,
सामाज से.
उत्सव होगा,
समूह गान होगा.
जैसे उषा के आने पे,
प्रकृति कलरव करती है.
तभी हर इंसान,
प्रयाश करेगा।
जैसे अंधेरो में दुबके,
अपने पंखों को समेटे पक्षी,
पंखो को पसार,
आकाश को चुनौती देते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लक्ष्य


सबका हित हो,
सबका कल्याण हो.
मानव के संग,
मानवता का विकास हो.
न किसी का शोषण हो,
न कोई शोषित ही रहे.
भारत वर्ष में,
जन-जन का उत्थान हो.
ना कोई बच्चा दूध को तरसे,
ना बूढें अब भोजन को.
शिक्षित – अशिक्षित सबका,
सबपे हक़ अब सामान हो.
किसी एक के आंसू पे,
ना दूसरे का मुस्कान हो.
भारत वर्ष में,
जन-जन का उत्थान हो.
मानव के संग,
मानवता का विकास हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बांकपन


तारीखे-मिलन पे चर्चा करनी हो अगर,
तो महफ़िल में मेरा कोई काम नहीं.
जश्ने-कुर्बानी मनानी हो अगर,
तो मेरा बांकपन अभी बाकी है.
होठों को पीने की तमन्ना अब कहाँ,
रक्त का कतरा बहना हो अगर,
तो मेरी जवानी अभी बाकी है.
मत पूछो की जोशे-उद्गम कौन है मेरा,
अभी इस सागर में,
कितनी नदियों का मिलना बाकी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर