वर


मुझे इतना ज्ञान तू दे पिता,
की भूखा भी मैं मुस्कराता रहूँ।
अन्धकार मिले मेरी आँखों को,
या तिरस्कार मिले इस जीवन को,
मैं हर पल तेरा नाम गाता रहूँ।
पतन भी हो जीवन का अगर,
मैं पाप कर्म भी करता रहूँ अगर.
मुझे इतना वर तू दे पिता,
मैं हर पल वेदो को पढ़ता रहूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

मुर्ख से मोहब्बत


टूटते है शहंशाह के, तो ताज बनते हैं,
ये हम हैं जो उसे आंसुओं में बहा गए.
मुर्ख से मोहब्बत, उजाड़ देती है किस्मत,
हम आज भी अकेले, वो लाखो रिश्ते बना गए.
दिल्रुबावों का दिल और दामन, दोनों ही,
खुसबू से भरा है, मोहब्बत से नहीं.
मोहब्बत तो मैले – कुचले आँचल में उसके,
हम जिसके आँखों में कीचड़, ह्रदय में खंजर उतार गए.
मैं किस खुदा को सजदा दूँ और किस दर पे,
खुदा खुद दिग्भ्रमित है,
जब वो अपनी चुनर को तीज की साड़ी बता गए.
मोहब्बत का जिक्र मुझसे ना करो यारो,
इस कुरुक्षेत्र में जीतकर, वो मृतकों को काफ़िर बता गए.
घूम-घूम कर मांगते हैं,
हर गली-मोहल्ले में औरतों का सम्मान,
जवान जिस्म की चाहत में जो, अपनी बीबी को छोड़ गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं नहीं हूँ


मंजिलों को पाने के लिए,
समझौतों पे समझौते हुए.
एक बार मंजिल मिल जाए,
तो फिर,
कौन अपने, कौन पराये।
ये वसूल रखने वालों की,
भीड़ में मैं नहीं हूँ.
एक ही समय में खाता हूँ,
सेवइयां और मछलियाँ, दोनों
ईद और दिवाली के,
इंतज़ार में बैठा कोई,
मजहबी मैं नहीं हूँ.
और उठता हूँ आज भी,
माँ की लोरी सुन कर,
रेडिओ मिर्ची और एफ. एम.,
से जागने वालो की,
जामत में मैं नहीं हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

कर्ण


हर पल में बेचैनी है जिसके,
हर नींद में एक ही चाह,
एक बार सामना तो हो जिंदगी,
मैं रोक दूंगा अर्जुन की हर राह.
ना माँ की दुआएं हैं, न प्रियेसी की प्रीत,
न किसी से आशा है, न किसी का आशीष,
बस एक बार सामना तो हो जिंदगी,
मैं रोक दूंगा अर्जुन की हर जीत.

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

सौ बार लड़ूंगा हल्दीघाटी में


राते जितनी काली हो,
नशा उतना ही आता है मुझे,
दर्द जितना गहरा हो,
जीने में उतना ही मज़ा है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
दिल्ली की रौनक मुबारक हो तुम्हे,
मेवाड़ की शान भाती है मुझे।
मैं राजपूत हूँ, कोई मुग़ल नहीं,
योवन की हर धारा तेरे लिए है,
माँ की गोद लुभाती है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रण


जहाँ विश्व थम जाएँ,
मैं वहां तक प्रयाश करूँ,
थक कर गिर भी जाऊं,
तो उठ कर साहस,
फिर एक बार करूँ,
हे प्रभु हरि विष्णु।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रण


अहंकार से रिक्त रहूँ,
पाखण्ड से मुक्त रहूँ,
प्रेम से सदा संचित रहूँ मैं,
पाप से सदा बंचित रहूँ मैं,
हे प्रभु विष्णु।
वेदो को गीतों में ढाल के,
जन – जन को पहना दूँ,
धर्म को माँ, और माँ को धर्म मान के,
सम्पूर्ण भारत को नहला दूँ.
अभिलाषों से रिक्त रहूँ,
लालशा से मुक्त रहूँ,
ज्ञान से सदा संचित रहूँ मैं,
अज्ञान से सदा बंचित रहूँ मैं,
हे प्रभु हरी बिष्णु।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’