
बिल्लियों के बीच में खेलती हैं,
बिल्लियों से बनके वो,
कभी आँख लड़ती,
तो कभी आँख चुराती वो.
चलती है इधर- उधर,
अदावों से इतराते हुए,
कभी छज्जे पे बैठी,
कभी आँगन,
में जलवे बिखराती वो.
इक पल में ही हज़ारो,
रंग उतर आते हैं, आँखों में,
कभी रातों में सजती,
कभी ठुमके लगाती वो, परमीत