तेरी ही रूह से बगावत कर दे


आ, जामने भर की बंदिशें तोड़कर
जिस्मों को ज्वाला कर दे।
शांति की हर राह मेरी जाती है
तुम्हारे वक्षों पे.
आ, इन्हे अब आजाद कर दें.

तुम्हारे कठोर अंगो से टकराएं
झूम-झूम कर,
आ, इन धीमी हवाओं को तूफ़ान कर दे।
शर्म से झुकी इन नजरों को
लाज के भंवर से निकाल कर
आ, इन्हे सुलगती आंच कर दें।

उलझा कर साँसों को साँसों से
आ, धड़कनों को बेताब कर दें।
मचल उठे,
तेरा अंग – अंग छूने को मुझे, इस कदर
की तेरा जिस्म,
तेरी ही रूह से बगावत कर दे।

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मन को साधना ही, तो साधना है


मन को साधना ही, तो साधना है
बह गए जो इश्क़ में, तो ताउम्र बहना है.
वो नजर नहीं है तेरी कामना में
वो तो माया का एक छलावा है.
धोखा तो उससे भी आगे हैं,
जब बाहों में लेके, ठोकरों में तौला है.

सच की तलाश में भटके कई,
हर जिस्म में बस एक धोखा है।
जिसे चाहा दिल से अपना बना लें,
वो ही हर बार निकला बेवफा है।
अब ना आस लगती किसी चेहरे से,
ना दिल को कोई सपना भाता है।
मन को साधना ही, तो साधना है
वरना हर चाह में बस ताउम्र बिखरना है।

हर मुस्कान में अब डर सा है,
हर क़सम के पीछे एक पर्दा है।
जिसे समझा था रूह का रिश्ता,
वो भी दिल का एक सौदा निकला है।
अब न रंज है, न कोई शिकवा,
बस खुद से मिलने का वादा है।
जिसे पाना समझा था मंज़िल कभी,
अब उसे भूल जाना इबादा है।

मन को साधना ही, तो साधना है
इश्क़ में बहना नहीं — संभलना है।

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वो जो आग बन गई


उसकी नज़र है जो याद, आती बहुत है
उसकी कमर है, जो आग लगाती बहुत है।
नाज़ुक बदन पे बक्षों का भार, पहले चोली,
फिर दुपट्टा, अब किताबें उठाती बहुत हैं।

शर्म वो जो समंदर डूब जाए,
भँवर वो जो भँवरा भूल जाए।
उसके रसीले अधर, वो जाम जो,
हिम्मत बढ़ाती बहुत है।

बालों की लट है, जो बादलों को लूट लाए,
काजल की रेखा, जो नींदें उड़ाए।
ज़ुल्फ़ों के साए वो जो, जिस्म ही नहीं,
परछाईं तक को बहकाती बहुत है।

चाल में नज़ाकत, निगाहों में फ़ितरत,
लफ्ज़ों में शोला, अदाओं में राहत।
वो जब भी हँसे, क़सम, मौसम, कायनात —
हर दिल को शायर बनाती बहुत है।

अब वो न ज़ंजीरें सहती है ज़ालिम,
न चौखट पे रुकती है बग़ावत की आलिम।
कसम ले कि कह दूँ, अब वो नाजुक औरत, परी या मल्लिका नहीं —
इक तूफ़ान है, जो हर सीने में उठती बहुत है।

जिस्म पे जो नज़रों की तिजारत रखे,
उन नज़रों में अब आग भरती बहुत है।
जो पूछे ‘तेरी औक़ात क्या है?’
हँस के कहे — इंकलाब करती बहुत है।

ना बिंदी, ना चूड़ी, ना परदे का डर,
अब लब पे है सच, आँखों में है नज़र।
वो पंख पसारे जो उड़ चली एक बार,
ज़मीं क्या, ये अम्बर भी जलती बहुत है।

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चिंतन की कटारी हो


तुम शहर की धुप में लगती बड़ी प्यारी हो
तुम प्रिये अब भी हमारी चिंतन की कटारी हो.
लट तुम्हारी बूंदों में, बूंदें तुम्हारी लट पे
प्यास हमारी बिना मिटाये, दुप्पटे को भिंगो रही हो.

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गजब की धुप


गजब की धुप में निखरा तेरा रूप
या निखरे तेरे रूप पे गिरती गजब की धुप
तेरी मुस्कान एक कातिल सी
या कातिल है तेरा मुस्कुराना खूब.

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बिजली बना दी


अंगों-ने-अंगों से टकरा के बिजली बना दी
कम्बख्त फिर जलने से कौन बचता?
सबने कहा की परमित ना जा उसके पास
मगर राजपूत रण से पीछे कैसे हटता?

जवानी है, जवानी है, जवानी है-२
तभी तो निगाहों में कहानी है.
कोई बंद कमरे में सुलग रहा
कोई बहती दरिया का पानी है.

वक्त के भीड़ में तुम्ही बगल गए
हम तब भी, अब भी अकेले हैं.

तेरी आँखे ऐसी, की तनहा शराब हो गयी
तेरे जिस्म पे रेंग के हवा मेरे गावं की
जो मीठी थी, अब आग हो गयी
तू क्या खुद को संभाल रही है और किसके लिए
बिहार में चर्चा है की तू अब जवान हो गयी.

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वो दवा पिलाती भी हैं तो भाईजान कहके


दरियावों को किनारों की चाहत नहीं होती
समंदर तक आते-आते वो आग नहीं होती।
तू घमंड में जिसे पाकर, इतहास हैं उसका,
वो किसी की नहीं होती।
हम बिहारी हैं, नाप लेके हैं आँखों से आकार का
हम सी दें चोली तो वो छोटी नहीं होती।
तू जिसे चाहे चुन ले, तेरा अधिकार है
सबका ससुराल बिहार हो ऐसी किस्मत नहीं होती।

कितना तोड़ोगे हमको नजरों को चुराकर हमसे
हम तो पहले ही टूटे हैं दिल को लगा कर तुमसे।

इश्क़ में तुम्हारी गली का नजराना बहुत है
और इश्क़ में हमारी गली में मयखाना बहुत है.
तुम्हे मिलता है सबकुछ बिना पुकारे
हमारी पुकारों में बस तेरा नाम बहुत है.

कातिल की नजर को सलाम करके
हम बैठ गए है इश्क़ में नाकाम होके।
दर्द भी बता दें तो क्या भला
वो दवा पिलाती भी हैं तो भाईजान कहके।

A sip


I am taking alcohol as I can not take you
I am sipping it slowly as I can not do deep in you
The whole world is meaningless if ours legs don’t hold each other
I am jerking as I cannot jump on you.

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तरंगिणी हो


ह्रदय की तुम स्वामिनी, मेरे मन में विराजी हो
चंचल नयनों से वेधती, हर पल मेरी साँसों की वेदी हो.
सरिता सी नित बह रही, कुरेदती हो पाषाण को
टूट-टूट, बिखर रहा मैं नित, तुम प्रबल-प्रखर-प्रचंड, तरंगिणी हो.
तुम्हारे मतवाले नयनों की चाल, जैसे अरण्य में स्वछंद विहरति मृगनी हो.

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तेरे अंगों पे कहीं पटना,कहीं छपरा तो कहीं सीवान दीखता है


तू मुस्कराये तो पुरे के पुरे मानचित्रा पे
पूरा -का – पूरा बिहार दीखता है.
तुम्हारे मम्मी -डैडी पूजनीय ही नहीं
सिर्फ मेरे लिए भगवान् ही नहीं
तुम्हारे मम्मी -डैडी, दादा-दादी, भाई-बहन
उनमे पूरा -का-पूरा ससुराल दीखता है.
तू शर्माए तो वो सर्दी की रात
वो बोरसी की आग
और उसमे पकता वो लिट्टी दीखता है.
तेरे नयन जैसे मेरे गावँ के पोखर
तेरी कमर, जैसे चलनी में चोकर
तेरी कमर पे झूलती ये चोटी
पीपल पे वो मेरा झूला दीखता है.
तू पूरी -की-पूरी मुझे मिल जाए
तो मुझसे धनवान कौन, बता?
की तेरे अंगों पे कहीं पटना,
कहीं छपरा तो कहीं सीवान दीखता है.

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