उसकी नज़र है जो याद, आती बहुत है
उसकी कमर है, जो आग लगाती बहुत है।
नाज़ुक बदन पे बक्षों का भार, पहले चोली,
फिर दुपट्टा, अब किताबें उठाती बहुत हैं।
शर्म वो जो समंदर डूब जाए,
भँवर वो जो भँवरा भूल जाए।
उसके रसीले अधर, वो जाम जो,
हिम्मत बढ़ाती बहुत है।
बालों की लट है, जो बादलों को लूट लाए,
काजल की रेखा, जो नींदें उड़ाए।
ज़ुल्फ़ों के साए वो जो, जिस्म ही नहीं,
परछाईं तक को बहकाती बहुत है।
चाल में नज़ाकत, निगाहों में फ़ितरत,
लफ्ज़ों में शोला, अदाओं में राहत।
वो जब भी हँसे, क़सम, मौसम, कायनात —
हर दिल को शायर बनाती बहुत है।
अब वो न ज़ंजीरें सहती है ज़ालिम,
न चौखट पे रुकती है बग़ावत की आलिम।
कसम ले कि कह दूँ, अब वो नाजुक औरत, परी या मल्लिका नहीं —
इक तूफ़ान है, जो हर सीने में उठती बहुत है।
जिस्म पे जो नज़रों की तिजारत रखे,
उन नज़रों में अब आग भरती बहुत है।
जो पूछे ‘तेरी औक़ात क्या है?’
हँस के कहे — इंकलाब करती बहुत है।
ना बिंदी, ना चूड़ी, ना परदे का डर,
अब लब पे है सच, आँखों में है नज़र।
वो पंख पसारे जो उड़ चली एक बार,
ज़मीं क्या, ये अम्बर भी जलती बहुत है।
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