तो प्रतिकार करना होगा


ये कैसी जिंदगी है, जो दर्द से भरी हैं.
आँखों में काजल है, वो भी आंसू से भींगी हैं।
ओठों पे है लाली, कानो में है बाली,
खनकती है पायल, पर अपने ही आँगन में नौकर बनी है.
थामा था जिसने हाथ, लेके फेरे हाँ सात,
पर एक रात के बाद ही, उसके बिस्तर पे लाश सी पड़ी है.
जिसकी हाँ कमर पे, कितने मर मिटे,
जिसकी एक झलक पे, कितने दीवाने थे मचले,
आज उसी के अंगों पे, खून की नदी है.
तो प्रतिकार करना होगा, ऐसे इंसानो का,
जिनकी नजर में, औरत सिर्फ एक बेबसी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्रबल, सुयोजित आकर्मण


दिल के सरहदो पे मेरे,
उनके चक्षुओं का जाल फ़ैल रहा है.
गिर रहें हैं मेरे सीमा – प्रहरी एक – एक कर,
उनके हुस्न ने ऐसा,
प्रबल, सुयोजित आकर्मण कर दिया है.
भयभीत हो उठीं है सारी धड़कने मेरी,
अपने भविष्य की चिंता से ग्रसित हो कर.
विखंडन के कगार पे है,
मेरा ३६ सालों का ये एक छत्र साम्राज्य।
अब जिसकी जमीं पे,
उनकी उपनिवेशिक गतिविधिया उत्थान पे हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं शर्म से लहुँ-लुहान हो गया


वो कॉलेज का पहला दिन,
क्या खास बन गया!
वो पहली बार मिली,
और दिल खामोश रह गया.
दो चोटी जुल्फों की,
सीने पे झूल रहीं।
वो पास आके बैठीं,
और मैं शर्म से,
लहुँ-लुहान हो गया.
वो ज्यों-ज्यों संभालती रहीं,
अपना दुप्पट्टा।
मैं कभी पेन्सिल उठता रहा,
कभी पेन गिराता रहा.
उनकी घूरती आँखों में,
एक सवाल बनके रह गया.
फिर नहीं हुआ कभी ये हादसा,
उनकी आँखों में कोई और था बसा.
वो चलती रहीं परिसर में,
थाम के किसी की बाहें।
और वो यादे लिए मैं,
अकेला ही रह गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अब तेरे पाँवों में बेड़िया नहीं, खनकती चूड़ियाँ हैं


सितारों से भी जयादा तन्हाई लिए हूँ,
एक उदासी सी बैठ गयी है जिंदगी में,
तेरे जाने के बाद.
मैं आज तक वो दर्द, वो बेबसी,
वो गहराई लिए हूँ.
जवानी तो उसी दिन ढल गयी,
कहानी भी जिंदगी की खत्म हो गयी,
जब तूने राहें बदल लीं.
मैं तो आज तक वो निशाँ तेरे क़दमों के,
संजोएं बैठा हूँ.
साँसे तो है, बस सिसकती हुई,
तेरे लौट आने की आस लगाये।
इन्हे कौन बताये?
की अब तेरे पाँवों में बेड़िया नहीं,
खनकती चूड़ियाँ हैं.
मैं आज भी ये राज इनसे,
छुपाये बैठा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं


मोहब्बत में उनके अर्ज किया था,
की जान तक अपनी लूटा देंगे।
हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं,
बर्बाद ही करके छोड़ेंगे।
मोहब्बत कुछ ऐसे बढ़ी अपनी,
की जमाना तक दुश्मन हो गया.
पता भी हमें तब चला, जब उनकी,
डोली उठा कोई और ले गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अभी रहे दी घोंसला में


ऐसे मत चलाईं राजा जी,
गुलेल तान – तान के.
की छोट बिया चिड़ाइया,
अभी रहे दी घोंसला में.
कब तक रही चिड़ाइया,
रानी ई घोंसला में.
आज उड़े द, ले लेव इहो
मजा खुलल आसमा के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम एक धागे में बंध के


मुझे हर रिश्ता पसंद है तेरी आँखों से होकर,
आ जुल्म-सितम सब सह लें, हम एक धागे में बंध के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे


यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे,
और तू यूँ ही मेरी बाहों में सिमटती रहे.
तेरी साँसे जीवित रखें मेरी नसों को,
यूँ ही मेरे रुधिर को गर्मी देती रहें।
मेरी पलकों पे तेरी ओठो का भार रहे,
बस एक रात ही सही सोनिये,
तेरी अधरें मेरी अधरों का आधार बनें।
ऐसे फिर रसपान करता रहूँ रात भर,
की जीवन भर गुमान रहे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जब से तुम जवान हुई


जब से तुम जवान हुई,
सारा शहर परेशान हुआ.
मयखाने तक सुख गए,
जो तेरा दीदार हुआ.
बादलों ने मंडराना छोड़ा,
भौरों ने कलियों संग,
गुनगुनाना छोड़ा।
आँखों में उतर आएं हैं,
आसमान के सारे तारे।
जब से दुपट्टा तेरा,
कुछ ज्यादा ही ढलकने लगा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दर्पणों में चेहरे नहीं गुनाह दीखते हैं


दर्पणों में चेहरे नहीं गुनाह दीखते हैं,
इसलिए तो हुस्न वाले इनसे सवरतें हैं.
करीब आने पे बोझ बढ़ जाता है,
इसलिए हर रात के बाद वो शहर बदल लेते हैं.
जाने आँचल है या बवंडर -तूफ़ान मरुत्स्थल का,
सैकड़ों को सुला कर बाहों में,
वो अब भी मासूम बन लेते हैं.
इश्क़ के नसीब में उजड़ना ही लिखा है,
ये तो हुस्न वाले हैं जो हवाओं के संग मुख मोड़ लेते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर