Being dirty is the symbol of the success


The terminal looks beautiful when it is dirty. That is the moment we start caring and giving attention to it.

Parmit Singh Dhurandhar

हुस्न चारदीवारी में नहीं बंधती


हर खूबसूरत गली,
मंजिल नहीं होती।
कुछ राहें,
सदा अँधेरे में होती हैं,
पर उनपे,
जिंदगियां बर्बाद नहीं होती।
आंसू बहाने से,
आँखे ह्रदय के करीब नहीं होती।
हुस्न वाले मोहब्बत में,
किसी एक की नसीब में नहीं होती।
दस – घाटों से गुजरने के बाद,
नदिया प्यासी होती है सागर के लिए.
भरी जवानी में हुस्न,
चारदीवारी में नहीं बंधती।

परमीत सिंह धुरंधर

चारपाइयों की कसरत


दो पल की आरजू थी,
दो जिन्दगियाँ बदल गयीं।
उनके आँखों के काजल से,
रोशनियाँ बदल गयीं।
ठुकराती रहीं,
ता-उम्र वो मेरी मोहब्बत।
और जब भी मेले में मिलीं,
निशानियाँ बदल गयीं।
आज भी,
घूँघट में उनका चेहरा।
मगर जवानी ढलते-ढलते,
कई कहानियाँ बदल गयी.
चारपाइयों की कसरत,
भले मैंने नहीं की है.
पर दिया बुझाते-बुझाते,
कई चारपाइयां बदल गयीं।

परमीत सिंह धुरंधर

सीने पे किताबे तू रखने लगी है


राहें – निगाहें सब उठने लगी हैं,
दुप्पटे में जब तू निकलने लगी है.
नजरे झुकाकर, उमर को छुपाकर,
सांझो – पहर जब निकलने लगी है.
मंदिर – मस्जिद सब सुने पड़े हैं,
निगाहों में काजल जो तू रखने लगी है.
जुल्फों को बाँध कर, चुनरी को भींचकर,
बदल कर गलियां, आने – जाने लगी है.
कब तक बचेंगे, कितने बचा लेंगे,
घर-घर में दीवारे उठने लगी है.
बच्चों की अम्मा, बच्चों के अब्बा,
अब तो,
दादा – दादी में दरारें परने लगी है.
जब से सीने पे किताबे तू रखने लगी है.
राहें – निगाहें सब उठने लगी हैं,
दुप्पटे में जब तू निकलने लगी है.

परमीत सिंह धुरंधर

ख़्वाब


जब से सीना तुम्हारा उभरने लगा है,
गावं से शहर तक मौसम बदलने लगा है.
दुप्पटे के रंग से ही घायल हो रहे है यहाँ कितने,
और कितने,
बाँहों में भींचने का ख़्वाब सजोने लगे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

तेरे साथ की


मुझे जो कभी समझा ही नहीं वो रातें तेरे साथ की,
घड़ी-घड़ी याद आती है वो बातें तेरे साथ की.
समुन्दर बन गया है दर्द मेरा बढ़ – बढ़ के,
फिर भी मिट नहीं सकती वो चाहत तेरे साथ की.
होठ चाहे तेरे, जिसका भी जिस्म चुम लें,
मेरे ओठों को बस प्यास है आज भी तेरे सांस की.
घड़ी-घड़ी याद आती है वो बातें तेरे साथ की.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम की विवशता


गोधूलि बेला में लम्बी होती परछाइयों को देखते – देखते, रात ने अपने चादर में छुपा लिया। रात के इस सन्नाटे में जब झींगुर चीत्कार करने लगे तो आँखों से बहते आंसू के साथ उसने किवाड़ों  को भिड़ा के, चूल्हे के गर्म आग पे पानी डाल दिया। अभी कमर को सीधा ही किया था, चारपाई पे लेट कर, अचानक एक साथ भौंकते कुत्तों ने उसकी अलसायी आँखों में एक साथ कई दीप जला दिए. यूँ ही लेटे-लेटे, वो एक हप्ते पहले ही आई चिठ्ठी को याद कर रही थी, तभी बहार बरामदे से ससुर जी की आवाज आई किसी के साथ बातचीत करते हुए. अचानक हवा के तेज झोंके सा वो बिना घूँघट के ही कब दरवाजा खोल कर ससुर के सामने पहुँच गयी, खुद उसे भी पता नहीं चला. जब उसे एहसास हुआ तो उसने आँगन में आ कर अपनी सास को जगा के बाहर भेजा और खुद चूल्हे में आग जला कर, हांडी चढ़ा कर कुछ मधुर सा लोक गीत गुनगुनाने लगी.
चाँद उस समय बिलकुल उसके सर के ऊपर से मुस्करा रहा था……
XXXXXXXXXXXXXXXX                                          भाग – 2                                                  XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
हिमाचल प्रदेश मेरा हमेसा से प्रिये रहा है. इसका एक ही कारन रहा है की मुझे यहाँ आके ही नीलू मिली। जी हाँ नीलू, जिसकी बाँहों में आकर मैं जिंदगी की हर राह चल रहा था. आज तीन साल हो गए, हमें साथ रहते हुए. आज वैलेंटाइन डे पर मैं जल्दी उठ कर, उससे ही मिलने जा रहा हूँ.
मैंने गुलाब के चार गुलदस्तें लिए है, ये चौथा साल है हमारा। आज मैं उससे शादी के लिए पूछने वाला हूँ. जैसे ही विश्विधालय के प्रांगन में पहुंचा, मैंने नीलू की हाथों में गुलाब का एक बड़ा गुलदस्ता देखा। वो आज बहुत खूबसूरत लग रही थी और उसके साथ विनोद था. जैसे ही उसने मुझे देखा, वो तुरंत विनोद को छोड़ कर मेरे पास आई और मुझे दूर ले गयी. मैं उसकी इस अदा से बहुत खुश हुआ. मैं कुछ कहने वाला ही था की नीलू ने मेरे दोनों हाथों को अपने हाथों में ले कर मेरी धड़कने बढ़ा दी. उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा “बेबी, मुझे पता है तुम्हे दुःख होगा, लेकिन मैं अब ज्यादा तुम्हारे साथ नहीं रह सकती हूँ.” मुझे लगा की जैसे कोई मज़ाक है. फिर उसने कहा “बेबी, अब जब मैं तुम्हे देखती हूँ तो मुझे अपने भाई का एहसास होता है.” वो मेरा हाथ पकडे पांच मिनट तक जाने क्या सुनने का इंतज़ार कर रही थी और फिर मेरा हाथ छोड़ कर चली गयी. मैं समझ ही नहीं पाया की जाऊं कहाँ?
XXXXXXXXXXXXXXXX                                          भाग-३                                                    XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
मैं ज्यूँ ही बस में आकर सीट पे बैठा, मेरी बगल में कोई औरत अपने दो बच्चो के साथ आके बैठी। कुछ देर बाद मुझे एहसास हुआ की वो दो बच्चो को एक सीट पे संभाल नहीं पा रही. एक बच्चे को अपनी गोद में लेने के लिए, मैंने ज्यूँ ही उसकी तरह नजर उठायी, मेरी निगाहें उससे देखती रह गयी. मैंने जैसे ही उसके एक बच्चे को पकड़ा, वो बोली ” जी मेरे बच्चे हैं.” मैंने कहा आप आराम से बैठिये। मैंने कहा “शायद तुमने मुझे पहचाना नहीं नीलू” फिर वो बोली “मैं अब व्याहता हूँ. मुझे छोड़ कर किसी कुवारी पे धयान दो, तो तुम्हारा कुछ हो.”  बस से उतरने के बाद वो बोली, “चलो घर पर, चाय पी कर जाना. यूँ भी बहुत दिन बाद मिले हो, वैलेंटाइन डे पे मुझे जो छोड़ के गए.” मेरा तो दिमाग सुन्न, लड़किया भी गजब होती हैं, दुनिया को बताएंगी उन्होंने छोड़ा और मिलने पे शिकायत की हमने छोड़ा।
चाय पीते-पीते मैंने पूछा, “इनके पापा कब आएंगे, सोच रहा हूँ उनसे मिल के जाऊं।” मेरे ऐसा कहते ही वो उदास हो गयी. पूछने पे उसने बताया की उसके बच्चों के पापा सिर्फ सप्ताह के अंत में एक रात के लिए आते हैं, बाकी दिन वो अपनी पहली पत्नी के पास रहते हैं. मुझे समझ में नहीं आ रहा था क्या बोलूं। फिर उसने बताया की पीएचडी के दौरान ही उसकी सरकारी नौकरी लग गयी और वहीँ ऑफिस में उसके रीजनल मैनेजर से उसको प्रेम हो गया. नीलू, ” हम एक हो चुके थे और मैंने एक दिन शादी को कहा क्यों की मैं गर्ववती हो चुकी थी. तब उन्होंने बोला की उनकी शादी हो चुकी हैं.” ओह! पीएचडी लैब और सरकारी दफ्तर में अगर कोई कुवारी लड़की घुसे तो वो फिर गृहणी बनके ही निकलती है.
मैंने कहा की फिर छोड़ दो उसको, वो तुम्हारा शोषण कर रहा है. नीलू, “नहीं, अब ये मेरे लिए पाप है की मैं किसी और मर्द के बारे में सोचूं भी. अब ये ही मेरी जिंदगी हैं. मैंने मन से उनको पति मना हैं और अब मैं किसी और के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती।”
लौटते समय मैं वो पुरानी कहावत ” सौ चूहे खा के बिल्ली चली हज को” सोच रहा था. लडकियां भी गजब की है भारत की, प्रेम चाहे जितनों से, जितनी बार कर ले, जितना आधुनिक बन लें, पर शादी के बाद मारना चाहती है सीता-सावित्री ही बन कर.

It got published on the Kavyasagar website also. Here is the link

http://kavyasagar.com/kahani-by-parmit-singh-dhurandhar/

 

परमीत सिंह धुरंधर

कमरिया करे लपालप, की लॉलीपॉप लागेलू


कमरिया करे लपालप, की लॉलीपॉप लागेलू।
कमरिया करे लपालप, की लॉलीपॉप लागेलू।
अइसन बा ताहर नजरिया, की चकाचक लागेलू।
कजरा पे तहरा बहकल सारा छपरा,
आ लहंगा से तहरा लहकता देवरिया।
जब करेलू टाइट चोली, मीठा ख़्वाब लागेलू।
कमरिया करे लपालप, की लॉलीपॉप लागेलू।
हिरणी सी चलके, मोह लेलु मोहनिया,
देख गदराइल जवानी, जाम भइल मलमलिया।
जब उड़ावेलु ओढ़नी, जिला टॉप लागेलू।
कमरिया करे लपालप, की लॉलीपॉप लागेलू।

परमीत सिंह धुरंधर

I wrote this after listening this video

The hot smoking girl


The hot smoking girl,

Black and tall.

With denim jeans,

And with a Gold Flake,

She held my hand.

We walked together,

At Rajiv Chowk .

Parmit Singh Dhurandhar

हुस्न


मोहब्बत की,
बस आरजू रखतें हैं.
हम आज भी,
अपने सीने पे काबू रखते हैं.
गुजरती हैं कई जसलीन,
मेरी गलियों से रोज.
करीब जाके भी,
हम उनके दुप्पटे से,
एक दुरी रखते हैं.
हारें हैं जिस हुस्न से,
इस खेल में कई सबरजीत यहाँ।
वो पर्दानशीं भी,
इन राहों में,
बस परमीत से खौफ रखते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर