अइसन तहर जवानी ए रानी,
अइसन तहर जवानी ए रानी।
बालम भये रसिया,
बुढऊ राजधानी।
नाद के बैल,
भुखाइल खड़ा.
खेल में फसल,
सुख के भइल काला।
अइसन तहर कमरिया ए रानी,
देवर धइलन खटिया,
सास भरे पानी।
परमीत सिंह धुरंधर
अइसन तहर जवानी ए रानी,
अइसन तहर जवानी ए रानी।
बालम भये रसिया,
बुढऊ राजधानी।
नाद के बैल,
भुखाइल खड़ा.
खेल में फसल,
सुख के भइल काला।
अइसन तहर कमरिया ए रानी,
देवर धइलन खटिया,
सास भरे पानी।
परमीत सिंह धुरंधर
बिखर जाती है काजल,
जब भी डालूं आँख में.
क्या बांधू गजरा,
कैसे इन जुल्फों में.
हर रात टूटती हैं,
मेरी ही आगोस में.
चूड़ी, कंगन और झुमके,
सब उदास है.
कितना भी सम्भालूँ,
इन्हे.
चोर ले ही जाता है,
हर रात उतार के.
जल रहा है दर्पण,
मेरे विरहा की आग में.
कई मास बीते यूँ ही इसकी,
बिना निहारे अंगो को मेरे.
क्या सजाऊँ इनको,
किसी खुसबू से.
हर रात जब डूबना ही है,
इनको फिर पसीने में.
परमीत सिंह धुरंधर
दिल धड़क – धड़क के कह रहा है,
मैं समंदर को मथ दूँ.
तू घूँघट तो खोल एक बार बस,
मैं सब कुछ आज अपना बेंच दूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरे दो नैनों के समंदर में,
कितनों के नाव डूबें हैं.
बस ओठों तक आने दे मुझे,
फिर जिंदगी – मौत, सब झूठे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
कभी तेरे आँखों का समंदर हो,
कभी मेरी बाहों का किनारा।
कभी दरिया उछलती हो,
कभी डूबा हो किनारा।
कभी दूर गगन पे हो तारें,
कभी दिए से हो उजियारा।
कभी तेरी आँचल से बांध कर कटे,
कभी रातें हो तेरी जुल्फों का साया।
कभी यूँ ही,
आलिंगन हो ओठों को चूमकर,
कभी हो दूर से,
शर्म से बोझिल आँखों का सहारा।
परमीत सिंह धुरंधर
जब तुम खामोश हो जाती हो,
मेरी बाहों में आकर।
हर थकान मिट जाती है,
तुम्हारी साँसों को छूकर।
यूँ ही गुजरती रहें रातें,
बिना कुछ कहे – सुने।
बस तेरी झुकी पलकें हों,
और मेरी गर्म साँसे।
मुद्दत तक हो यूँ ही बरसात,
की डूब जाए हर खेत और खलिहान।
यूँ ही सुलगती रहे, ये आग चूल्हे की,
न रोटी पके और न जले,
बस धुंओं से धुंधला, तेरा जिस्म हो,
और धुंआ उठाती रहें मेरी साँसें।
परमीत सिंह धुरंधर
मैं अपनी जुल्फों में बांधकर उनको,
जो इतराई,
वो मेरी नस – नस को झनका गए.
मैं ह्रदय चुराकर जो संवरने लगी,
वो दर्पण को सौतन मेरी बना गए.
प्यासा बनाकर, उनको जो छोड़ा मैंने,
वो बाबुल को मेरे पराया बना गए.
रुलाया जिसको इश्क़ में जी भरकर मैंने,
वो अधरों पे मेरे आग जला गए.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हारे उन्नत-उन्नत वक्षों पे,
फीका है चाँद अम्बर का.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.
तुम चलो तो दरिया सुख जाए,
प्यास बढ़ जाए सागर का.
तुम्हारे गहरे-गहरे नैनों पे,
दम्भ है झूठा सागर का.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.
तुम्हारे नितम्बों पे झूलती ये चोटी,
जैसे चन्दन बन का मतवाला भुजंग।
तुम्हारे मधुर – मधुर इन अधरों के आगे,
देवों का अमृत विषैला है.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.
परमीत सिंह धुरंधर
मोहब्बत में पगला के हम भी,
बुरका पहनने लगे हैं.
वो तो दिखती नहीं हैं,
और हम भी खुद ही सवारने लगे हैं.
शर्मो-हया की अपनी दे के दुहाई,
वो बैठी है घर की दीवारों में,
और हम भी उनके छत पे,
अपनी पतंगें भिड़ाने लगे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
कई रिश्ते मेरे,
आज भी गुनाहों के साये में हैं.
और कई रिश्तों के लिए मैं,
आज भी गुनाहें कर जाऊँगा.
वो मेरी न बन सकी,
ये किस्मत नहीं,
उनकी मर्जी है,
वो अगर आज मुस्करा दें,
तो उनको अपना बनाने के लिए
आज भी क़यामत मचा जाऊंगा.
परमीत सिंह धुरंधर