मैराडोना मैं, मेडोना तू


रूप-रंग में सोना तू,
अंग-अंग से टोना तू,
आज तो घूँघट खोल दे रानी,
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
मैराडोना मैं, मेडोना तू.
आज की रात लम्बी है,
तन-मन पे छाई मस्ती है.
बस अपने ओठों से पिला दे तू,
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.
क्रिस्टिनो मैं, बिपाशा तू.

परमीत सिंह धुरंधर

This is dedicated to my favorite player Meradona and his love for the game.

तनी रहे दीं सियन चोली के


तनी धीरे -धीरे छुईं राजा जी,
अभी – अभी त अ जवानी आइल बा.
तनी रहे दीं,
तनी रहे दीं सियन चोली के,
दर्ज़ी लगन में बाहर गइल बा.
काहे ऐसे, काहे ऐसे बउराइल बानी,
सारा धन त अ रउरे खातिर बा.
तनी रहे दीं,
तनी रहे दीं कुछ थाती राजा जी,
अभी कउन उमर भइल बा.
काहे ऐसे, काहे ऐसे भुखाइल बानी,
सारा त अ दही जामल बा.
तनी रहे दीं,
तनी रहे दीं कुछ छाली राजा जी,
घिउवा बड़ा महंग भइल बा.

परमीत सिंह धुरंधर

ऐसी थी वो सुंदरी रे


जीवन प्यासा,
राते प्यासी,
प्यास बसी है,
इन अधरों पे.
ओठों के एक चुम्बन ने,
घाव किया दिल पे गहरी रे.
रात गयी,
वो भूल गयी.
मैं बैठा रहा,
बांधे वही गठरी रे.
नैनों का नैनों से,
फिर न मिलन ये होना था.
एक ही रात में सब ले गयीं,
ऐसी थी वो सुंदरी रे.

परमीत सिंह धुरंधर

कोई रखता है आज भी चोली तुम्हारी


गोरी जब से जवानी आई है,
हर तरफ से एक कहानी आई है.
कोई रखता है आज भी चोली तुम्हारी,
जिसकी सियान अब पुरानी हुई है.
हर गली, हर चौरस्ते पे,
सुबहा से होता है इंतज़ार तेरा।
जाने किस गली से तू निकलेगी,
और किन अंगों पे तेरे निशानी बनी हैं.
मत पूछ कैसे जीते हैं,
हम बेघर वाले।
हम पे तेरे आगोस की,
रूमानी अब तक छाई है.
थक के जो छूट गए,
तेरे आगोस से दूर.
उनके चेहरे पे, अब तक
वो जंगे-बईमानी खिली हुई है.

परमीत सिंह धुरंधर

कर्क राशि की वो लड़की


नसीब, दो ही हैं.
आवो, उन्हें बदल लें.
फिर भी, तुम्हे डर है.
तो ये वादा है,
दर्द तुम्हारें, मेरे।
और खुशियाँ मेरी,
सब तुम्हारी।
XXXXXXXXXX
आज फिर,
किसी से मोहब्बत हो गयी.
हाथों से दूर, आँखों से दूर,
ओठों से दूर, किस्मत से भी दूर,
मगर, फिर भीं उनकी चाह हो गयी.
कर्क राशि की वो लड़की,
इतनी ख़ास लगी.
मार्च में ही सेप्तेम्बर,
कर गयी.
आज फिर,
किसी से मोहब्बत हो गयी.
XXXXXXXXXX
यूँ तो निगाहें शरारत करेंगी,
मगर तुम मिलो तो पर्दा करेंगी।
जवाँ हसरते हैं, दबाऊं मैं कैसे,
वरना फिर मुझसे ही झगड़ा करेंगी।
लहराती हैं आँचल तुम्हारे लिए,
तुम्हारे लिए ही आँखें सवरतीं।
हर एक दरवाजे पे लगी हैं ये,
मगर तुम्हारे ही आहट से डरतीं।
यूँ तो साँसें पिघलती हैं रात दिन,
मगर तुम मिलो तो दुप्पट्टा करेंगी।
जवाँ हसरते हैं, दबाऊं मैं कैसे,
वरना फिर मुझसे ही झगड़ा करेंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

नकाब


तड़प रहा हूँ सीने पे जख्म को लिए,
कहीं तो मिल ए दिलवर, नकाब को गिरा के.

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मत


मेरी पलकें अभी तक हैं भींगी-भींगी,
उनका चेहरा झुर्रियों से सवरने लगा।
वो भूल गयीं जिन पेड़ों की छावं,
उनकी शाखाओं पे फिर न कोई पुष्प खिला।
राहें – किस्मत को देखा मैंने बदल – बदल कर,
उनकी झोली में पुष्प और मुझे बस काँटा मिला।

परमीत सिंह धुरंधर

प्रण और चुम्बन


जब ग़मों की रात हो, प्रिये,
तुम ओठों से पिला देना।
जब नींदें न हों आँखों में,
ख़्वाब न हो जीने को.
तुम आँचल अपने सरका के,
अंगों को छलका देना।
कांटे – ही – कांटे हो पथ में,
और प्यास से कंठ भी अवरुद्ध हो.
तुम आँखों की मदिरा को अपने,
मेरे नस – नस में उतार देना.
जब तुम ही मेरे साथ तो,
तब विकत क्या है कोई प्रण मेरा.
मेरे हर पराजय पे भी तुम यूँ ही,
विजय श्री का मीठा चुम्बन लगा देना.

परमीत सिंह धुरंधर

सावन


अबकी बरस रानी, अबकी बरस,
तहरा के उठा के ले जाएं।
सावन बरसे या न बरसे,
अंग – अंग ताहर भिंगो देहम।

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


मेरा इश्क़ मेरा इश्क़ है,
उनका हुस्न मेरा नहीं।
चाहत तो मुझे उन्ही की है,
मगर उनका जिस्म मेरा नहीं।
ये न इबादत है,
ना कोई जद्दोजहद उन्हें पाने की।
धड़कनो में मेरे महक है,
बस उन्हीं के आँचल की।

परमीत सिंह धुरंधर